धन बनाम आत्मसम्मान : सवाल 10 हजार रुपये के पुरस्कार का...
Fri, Dec 5, 2025
श्रीपति सिंह
भारत में ब्रिटिश राज के समय एक ब्रिटिश अफ़सर ने एक भारतीय युवक के चेहरे पर जोरदार थप्पड़ मारा। तुरंत ही युवक ने भी अपनी पूरी ताकत से उस ब्रिटिश अफ़सर को इतना ज़ोरदार थप्पड़ मारा कि अफ़सर ज़मीन पर गिर पड़ा।
इस अपमान से स्तब्ध होकर अफ़सर सोचने लगा – एक साधारण भारतीय युवक कैसे उस साम्राज्य के सेना अधिकारी को थप्पड़ मार सकता है जिसके बारे में कहा जाता है कि उस साम्राज्य में सूरज कभी अस्त नहीं होता।
वह तुरंत अपनी पोस्ट पर गया और उस भारतीय को कड़ी सज़ा देने की मांग की लेकिन उच्च पदस्थ कमांडर ने उसे शांत करते हुए कहा – उस भारतीय युवक को सज़ा नहीं, बल्कि पुरस्कार देना चाहिए। और पुरस्कार के रूप में उसे दस हज़ार रुपये उपहार में देने चाहिए।
अफ़सर ने घृणा से चिल्लाकर कहा – यह सिर्फ मेरा या आपका नहीं, बल्कि ब्रिटिश महारानी का भी अपमान है। और आप कह रहे हैं कि उसे सज़ा देने की बजाय उसे पुरस्कार दिया जाए!
कमांडर ने दृढ़ आवाज़ में कहा – यह एक सैन्य आदेश है और तुम्हें इसे बिना देर किए पालन करना होगा। जूनियर अफ़सर को कमांडर का आदेश मानना पड़ा। वह दस हज़ार रुपये लेकर उस भारतीय युवक के पास गया और बोला – कृपया मुझे माफ़ कर दें और इस दस हज़ार रुपये को उपहार के रूप में स्वीकार करें।
भारतीय युवक ने उपहार स्वीकार कर लिया और भूल गया कि उसे अपनी ही धरती पर एक उपनिवेशवादी अफ़सर के हाथों थप्पड़ खाना पड़ा था।
उस समय दस हज़ार रुपये बहुत बड़ी रकम थी। उसने उस धन का सही उपयोग किया और कुछ वर्षों में अपनी ज़िंदगी सुधार कर काफी संपन्न हो गया।
पहले वह एक साधारण युवक था, लेकिन अब समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति बन चुका था।
कई वर्षों बाद वही अंग्रेज़ कमांडर अपने जूनियर अफ़सर को बुलाकर बोला – क्या तुम्हें वह भारतीय याद है जिसने तुम्हें थप्पड़ मारा था?अफ़सर ने कहा – वह अपमान मैं कैसे भूल सकता हूँ?
कमांडर ने कहा – अब समय आ गया है। तुम उसे ढूंढो और सबके सामने जाकर उसे ज़ोरदार थप्पड़ मार कर आओ! अफ़सर बोला – यह कैसे संभव है? जब वह गरीब था तब उसने पलटवार किया। अब जब वह अमीर हो चुका है तो वह मुझे मार ही डालेगा।
कमांडर ने कहा – मैं जो कह रहा हूं, वही करो। यह भी तुम्हारे ऊपर आदेश है। जूनियर अफ़सर को आदेश का पालन करना पड़ा। वह उस भारतीय युवक के पास गया और उसे ज़ोर से थप्पड़ मारा।
लेकिन इस बार बिल्कुल उल्टा हुआ। भारतीय युवक ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। यहां तक कि वह हिम्मत करके अफ़सर की ओर देखने तक की स्थिति में नहीं था।
अफ़सर हैरान होकर वापस कमांडर के पास पहुंचा। कमांडर ने पूछा – मैं तुम्हारे चेहरे पर आश्चर्य देख रहा हूँ। तुम इतने हैरान क्यों हो?
अफ़सर ने कहा – जब वह गरीब था तब उसने पलटकर वार किया था। लेकिन आज जब वह संपन्न है तो वह आंख उठाकर देखने तक की हिम्मत नहीं कर पाया। यह कैसे संभव है?
अंग्रेज़ कमांडर ने धीमी आवाज़ में कहा – पहली बार उसके पास उसकी इज़्ज़त के अलावा कुछ नहीं था। वह उसे सबसे मूल्यवान समझता था और उसकी रक्षा के लिए वह जान जोखिम में डालकर भी लड़ गया।
लेकिन अब उसने उसकी रक्षा नहीं की, क्योंकि अब उसके पास उसकी इज़्ज़त से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका धन है।
जिस दिन उसने दस हज़ार रुपये उपहार में स्वीकार किए, उसी दिन उसने अपनी आत्मसम्मान और इज़्ज़त को रुपये के आगे बेच दिया।
और जब इंसान का आत्मसम्मान बिक जाता है, तो उसकी रीढ़ की हड्डी भी झुक जाती है।
आत्मसम्मान बनाए रखें। पद, उपहार या किसी लालच में खुद को बेचने के बजाय अपनी रीढ़ सीधी रखें।
नोट:- इस घटना का बिहार में चुनाव के ठीक पहले महिलाओं को दिए गए 10 हजार रुपये से या अन्य किसी से कोई लेना-देना नहीं है।
खरी-खरी : पिछड़ो, मत पढ़ो इसे, यदि तुम्हें सवर्णों की हरवाही ही करनी है
Fri, Dec 5, 2025
नवल किशोर कुमार
आदमी को इतिहास से सीखना ही चाहिए। लोग यह मानते भी हैं, लेकिन इस देश के ओबीसी कभी नहीं सीखते। वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी गलतियां करते जाते हैं और इस बात का रोना राेते हैं कि वे पिछड़े हैं। बिहार में संपन्न हुआ विधानसभा चुनाव भी इसका प्रमाण है कि कैसे पिछड़ों और अति पिछड़ों के वोट से सबसे अधिक राजपूत जीत गए। विधानसभा में भूमिहारों और ब्राह्मणों की संख्या भी उनकी आबादी के अनुपात में कई गुणा अधिक है। कुछ लोगों को यह लगता होगा कि बिहार में मुख्यमंत्री एक कुर्मी है और पिछड़ों का राज है, लेकिन सच यह नहीं है। पिछले बीस सालों से बिहार के पिछड़े इसी भ्रम में जी रहे हैं। सच तो यह है कि पिछड़ों का राज कभी आया ही नहीं। लालू प्रसाद के दौर में भी नहीं। तब भी सत्ता की बागडोर सवर्णों के हाथ में रही। एक जगदेव प्रसाद हुए, जो निछक्का दल बनाने की बात करते थे, लेकिन इसकी बुनियाद क्या होगी, इसे लेकर उनके मन में भी अस्पष्टता ही थी। रही बात कर्पूरी ठाकुर की तो मेरे सामने 10 अक्टूबर, 1978 को ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित एक खबर है।
इस खबर में यह बताया गया है कि प्रौढ़ शिक्षा योजना की शुरुआत करते हुए जयप्रकाश नारायण ने कर्पूरी ठाकुर के सामने ही यह कहा कि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने जाति के सवाल को बेहतर तरीके से सुलझाया है। उनके मुताबिक, ज्योति बसु ने जातिवाद को खत्म करने की दिशा में कई महत्वपूर्ण पहल किए हैं। यह सब वे कर्पूरी ठाकुर के सामने कह रहे थे, जो कि उस समय बिहार के मुख्यमंत्री थे और इस कारण मुख्यमंत्री थे, क्योंकि उन्हें जयप्रकाश नारायण का आशीर्वाद प्राप्त था।
मैं सोच रहा हूं कि कर्पूरी ठाकुर उस वक्त क्या सोच रहे होंगे जब जयप्रकाश नारायण उपरोक्त बात कह रहे होंगे। क्या उन्हें उनकी बात से चोट नहीं पहुंची होगी कि कैसे जयप्रकाश नारायण ने पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने के सवाल को उनके ही सामने खारिज कर दिया था। कर्पूरी ठाकुर तब कितने मजबूर रहे होंगे, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। फिर तो आगे चलकर यह भी हुआ कि जनता पार्टी के ही एक धड़े ने विरोध किया और कर्पूरी ठाकुर को मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा। यह तारीख थी 21 अप्रैल, 1979। कर्पूरी ठाकुर के मुकाबले रामसुंदर दास को खड़ा किया गया।
जिस दिन यह हुआ, उसके अगले दिन अखबार में कर्पूरी ठाकुर का बयान छपा था कि यदि नई सरकार में आरएसएस के लोग शामिल नहीं होंगे तो उनके समर्थक विधायक रामसुंदर दास सरकार को अपना समर्थन देने को तैयार हैं। हालांकि उनके इस बयान का कोई मतलब नहीं था, क्योंकि तब रामसुंदर दास ने मुख्यमंत्री और कैलाशपति मिश्र कैबिनेट मंत्री के पद की शपथ ले चुके थे। इसके पहले कर्पूरी ठाकुर के मंत्रिमंडल में भी कैलाशपति मिश्र कैबिनेट मंत्री थे।
दरअसल, इतिहास बताता है कि बिहार में पिछड़ों के आंदोलन की कोई विचारधारा नहीं रही, जैसा कि तमिलनाडु में गैर-ब्राह्मणवाद की रही। कर्पूरी ठाकुर को ब्राह्मणों की गुलामी से कोई परहेज नहीं था। उनके चेले लालू प्रसाद को भी नहीं रही है और नीतीश कुमार तो कर्पूरी ठाकुर का भी कान काटने वालों में हैं। नीतीश कुमार ऐसे बेगार बन चुके हैं जो सवर्णों के किसी बात का विरोध नहीं कर सकते। कर्पूरी ठाकुर और लालू प्रसाद में थोड़ी हिम्मत भी थी।
खैर, दो दिन पहले भागलपुर से एक शोधार्थी ने मुझे बताया कि वे शिवदयाल सिंह चौरसिया के जीवन व उनके कृत्य पर पीएचडी कर रहे हैं। अभी जब पिछड़े वर्गों के आंदोलन के बारे में सोच रहा हूं तो यह बात याद आई है। यह बात 1930 की है। लखनऊ के बेगम हज़रत महल पार्क में डिप्रेस्ड क्लास की एक रैली का आयोजन किया गया था। इसे डॉ. बी. आर. आंबेडकर संबोधित करने वाले थे। लेकिन कुछ ऐसा हुआ कि डॉ. आंबेडकर को बिना भाषण दिए वापस लौटना पड़ा था।
इस घटना की एक बड़ी वजह यह थी कि डॉ. आंबेडकर के लिए पिछड़े और दलित अलग-अलग थे। यह इसके बावजूद कि पिछड़ा समाज उन्हें अपना समर्थन दे रहा था। उनके आंदोलनों में शामिल हो रहा था। उत्तर प्रदेश के ही एक रामचरनलाल निषाद एडवोकेट थे, जो सूबे में शूद्र जातियों के लिए आंदोलन चला रहे थे। उनके सहयोगियों में रामप्रसाद अहीर, शिवदयाल चौरसिया, राजाराम कहार, बीएस जैसवार आदि नेता थे। ये सभी शूद्र जातियों के लिए समान व्यवस्था व अधिकार के पक्षधर थे, लेकिन डॉ. आंबेडकर को केवल अछूत जातियों से मतलब था। इतना ही नहीं जब लोथियन कमेटी यानी मताधिकार समिति का आगमन हुआ तो डॉ. आंबेडकर सिर्फ़ अछूत जातियों के दोहरे मताधिकार के पक्ष में प्रत्यावेदन दिए। इससे रामचरनलाल निषाद एडवोकेट को गहरा धक्का लगा। फिर तो जो हुआ वह इतिहास भी नहीं बताता। आंदोलन दम तोड़ चुका था। यह अलग बात है कि शिवदयाल चौरसिया संविधान सभा के सदस्य बने और बाद में काका कालेलकर आयोग के सदस्य भी।
कुल मिलाकर बात यह कि पिछड़े तब तक बेपेंदी का लोटा बने रहेंगे, जब तक उनके पास कोई विचारधारा नहीं होगी। लोहियावाद एक विचारधारा जरूर है, लेकिन इसमें भी खूब सारे छेद हैं। मुझे नहीं पता कि पेरियार की विचारधारा को बिहार के पिछड़े कब अपनी विचारधारा मानेंगे, लेकिन यह जरूर जानता हूं कि बिना पेरियारवाद के पिछड़ों की हालत कभी नहीं सुधरेगी। वे सवर्णों के गुलाम बने रहेंगे।
अपना दल एस की मासिक समीक्षा बैठक : पंचायत चुनाव को लेकर मिशन मोड में काम करने का आह्वान
Tue, Dec 2, 2025
लखनऊ।
अपना दल (एस) की राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल के नेतृत्व में पार्टी संगठन को निचले स्तर से शीर्ष स्तर तक पूरी तरह सक्रिय, अनुशासित एवं निर्णायक रूप से सशक्त बनाने के उद्देश्य से मंगलवार को कैम्प कार्यालय, 1-ए माल एवेन्यू, लखनऊ में एक व्यापक संगठनात्मक समीक्षा बैठक का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रदेश अध्यक्ष जाटव आर. पी. गौतम ने की। साथ ही पार्टी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री आशीष पटेल भी कार्यक्रम में उपस्थित रहे ।
बैठक में जिलेवार संगठनात्मक संरचना की गहन समीक्षा की गई। प्रत्येक जिले व विधानसभा स्तर से जिला अध्यक्षों एवं प्रभारियों द्वारा प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की गई तथा संगठनात्मक गतिविधियों का मूल्यांकन किया गया।
राष्ट्रीय अध्यक्ष ने आगामी पंचायत चुनाव को केंद्र में रखते हुए संगठन को “मिशन मोड” में कार्य करने का आह्वान किया। उन्होंने निर्देश दिया कि—
• प्रत्येक विधानसभा स्तर से लेकर हर बूथ पर मजबूत एवं समर्पित टीमों का गठन किया जाए।
• संगठन कार्यकर्ताओं की उपस्थिति गांव-गांव एवं घर-घर सुनिश्चित की जाए।
• जनता से संवाद को निरंतर एवं मजबूती के साथ आगे बढ़ाया जाए।
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राष्ट्रीय अध्यक्ष के प्रमुख निर्देश
- बूथ कमेटियों का तत्काल पुनर्गठन
- सभी प्रकोष्ठों को सशक्त बनाकर जन-आंदोलनों से जोड़ना
- पंचायत चुनाव तैयारी हेतु जनसंवाद कार्यक्रम, चौपाल बैठकों, प्रशिक्षण शिविरों व घर-घर संपर्क अभियानों में तेजी
- सभी पदाधिकारियों द्वारा जनसमस्याओं को मजबूती से उठाते हुए त्वरित समाधान सुनिश्चित करना
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राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल का संदेश
“संगठन पदों से नहीं, समर्पित कार्यकर्ताओं से बनता है।
चुनाव में जीत तभी सुनिश्चित होती है जब हर कार्यकर्ता मैदान में उतरकर जनता के बीच मजबूती से खड़ा दिखाई देता है।”
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प्रदेश अध्यक्ष जाटव आर. पी. गौतम का संबोधन
“संगठन की ताकत ही पार्टी की सबसे बड़ी शक्ति है। पंचायत चुनाव में सभी कार्यकर्ताओं को एकजुट होकर संघर्ष एवं संकल्प के साथ मैदान में उतरना होगा।”
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बैठक में पार्टी के विधायकगण सहित राष्ट्रीय, प्रदेश, जिला एवं विधानसभा स्तर के सभी पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
इस अवसर पर संगठनात्मक रूप से कमजोर क्षेत्रों की पहचान कर तत्काल विस्तार एवं मजबूती हेतु ठोस रणनीति तैयार की गई। आगामी प्रशिक्षण कार्यक्रमों, जिला स्तरीय सम्मेलनों, चौपाल संवाद अभियानों एवं बूथ बैठकों की विस्तृत रूपरेखा तय कर सभी पदाधिकारियों को स्पष्ट कार्य-दायित्व सौंपे गए।
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पार्टी का संकल्प
अपना दल (एस) ने संकल्प लिया कि आगामी पंचायत चुनावों में पार्टी पूर्ण शक्ति, अनुशासन एवं मजबूत संगठनात्मक ढांचे के साथ मैदान में उतरेगी तथा प्रदेशभर में जनता की सशक्त आवाज बनकर विजयी संघर्ष को दिशा देगी।