नीतीश जी जा रहे हैं... : विरह नहीं, राजनीतिक विश्वासघात की दास्तान है यह
Thu, Mar 5, 2026
गुंजन
यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, एक युग के अवसान का क्षण है। उस शख्स के प्रस्थान का क्षण है जिसने कभी बिखरे, बदनाम और बदहाल बिहार को कानून और विकास की पटरी पर चढ़ाया। लेकिन इस विरह की बेला में सबसे बड़ा प्रश्न सीने को चीरता है।
आखिर क्यों? इतनी बेबसी क्यों? इतनी मजबूरी क्यों?
कहानी आज की नहीं है। इसकी इबारत उसी दिन लिखी जाने लगी थी, जब गृह विभाग उनसे छीनकर सम्राट चौधरी को सौंप दिया गया। वह सिर्फ विभाग परिवर्तन नहीं था। वह दस्तक थी जिसे नीतीश जानकर भी अंजान बने रहे। कभी नरेन्द्र मोदी को बिहार की धरती पर कदम न रखने देने की हुंकार भरने वाले नीतीश आज उसी राजनीति के घेरे में क्यों सिमटते चले गए
क्या यह परिस्थितियों की मार थी या अपने ही लोगों की चाल?
राजनीति के गलियारों में यह फुसफुसाहट तेज है कि नीतीश को बाहर वालों ने नहीं, भीतर वालों ने हराया। वे चेहरे जो साथ खड़े दिखते थे वो भीतर ही भीतर जमीन खिसका रहे थे। सियासी चाणक्य कहे जाने वाले नेता के चारों ओर ऐसे ‘विभीषण’ जमा हो गए, जिन्हें सत्ता षडयंत्र की नई पटकथा लिखनी थी। कहा जाता है कि उनके पुराने साथी आरसीपी सिंह को इस साजिश की आहट पहले ही मिल चुकी थी। वे मिलकर सचेत करना चाहते थे। मगर मुलाकात ही नहीं होने दी गई। पटेल समाज के एक कार्यक्रम में दोनों एक ही मंच पर मौजूद थे। खबर लगी कि आमने-सामने बातचीत हो सकती है तो सुरक्षा का ऐसा पहरा बिठाया गया कि दो पुराने साथी कुछ पल अकेले बैठ भी न सकें। आरसीपी सामने थे, नीतीश सामने थे, लेकिन संवाद की दूरी सत्ता की दूरी से भी बड़ी साबित हुई। क्या यह महज संयोग था या सुनियोजित चुप्पी?
सच यह भी है कि गठबंधनों की लगातार अदला-बदली ने उनके नैतिक आधार को चोट पहुंचाई। लेकिन क्या यह अंत सिर्फ उनकी भूलों का परिणाम है? या फिर सुनियोजित राजनीतिक घेराबंदी का? नीतीश कुमार शारीरिक रूप से आज भले कमजोर हैं, लेकिन यह समय की मार है। मगर, सैद्धांतिक रूप से कमजोर? यह उनकी प्रकृति नहीं थी।
आज वे उस मुहाने पर खड़े दिखते हैं जहाँ से सियासी संध्या साफ दिखाई देती है। पर इतिहास इतना निर्दयी भी नहीं होता। उन्हें याद किया जाएगा, एक ऐसे मुख्यमंत्री के रूप में जिसने कानून-व्यवस्था को मुद्दा बनाया, सड़कों को रफ्तार दी और प्रशासन को जवाबदेह बनाया।
साथ ही यह भी दर्ज होगा कि राजनीति में सबसे घातक वार सामने से नहीं, पीछे से होता है। बुलंदी स्थायी नहीं होती और सत्ता की सबसे ऊंची इमारतें भीतर से खोखली हों तो गिरने में देर नहीं लगती। अगर खुद के आंखों पर भरोसा नहीं कर किसी के कहे पर विश्वास करके फैसले लिए जाएं तो अंत निश्चित है...
कुर्मी समाज के लोगों जागो : सत्तासीनों की अंधभक्ति करोगे तो वे आपको समझेंगे पैरों की धूल
Thu, Dec 18, 2025
दुर्गेश कुमार
जो समाज सत्तासीनों के पीछे अंधभक्ति में लगा होता है उसे सत्ता में काबिज लोग पैरों के धूल समझते हैं। किंतु जो समाज अपनी सिविल सोसाइटी के बताए गए रास्ते पर रहता है, उस समाज के लोगों को सत्ता सलामी करती है।
यह टिप्पणी विशेषकर कुर्मी समाज के बारे में ही है। हालांकि कई ऐसी जातियां है, जिसका चरित्र इसके जैसा ही है और हालत भी। इस समाज में तमाम अच्छाइयां हैं किंतु सबसे बुरी चीज यह है कि इस समाज की चेतना का नियंत्रण कोई बौद्धिक वर्ग नहीं करता बल्कि राजनीतिक वर्ग ही करता है। कोई भी राजनीतिक वर्ग कुर्सी के लिए झूठ बोल देता है, अपनी आकांक्षाओं के लिए सामाजिक चेतना पर गर्म पानी डाल देता है। लेकिन किसी भी समाज की सिविल सोसाइटी ऐसा करे, यह कम ही देखा गया है।
यानी आप विधायक हो गए, सांसद हो गए, मंत्री हो गए तो आपको इस समाज में सुना जाएगा... आपका मान सम्मान होगा.. भले ही आपकी बौद्धिक क्षमता न्यूनतम हो।...आप अपनी बौद्धिक शक्ति से समाज की चेतना को टस से मस नहीं कर सकते हैं... किंतु यदि आपके पास सत्ता की ताकत हो तो लोग आपके हाथों-हाथ ले लेते हैं। यह लक्षण उत्तर प्रदेश और बिहार दोनों राज्यों के कुर्मी समाज में देखा जा सकता है।
अब दलित भाईयों की सिविल सोसाइटी है।...किसी भी राजनीतिक स्तम्भ से ज्यादा ताकतवर है। ब्राह्मणों और भूमिहारों की सिविल सोसाइटी है, पहले से ही वह सर्वशक्तिमान है। किंतु मध्यवर्ती जातियों की सिविल सोसाइटी न के बराबर है। जो लोग है, उनको इस समाज के लोग रद्दी भर भाव नहीं देते हैं।
सिविल सोसाइटी अर्थात जो प्रबुद्ध वर्ग व्यक्तिगत लाभ को दरकिनार कर जन मुद्दों के लिए अपनी राय रखता हो, जरूरी एक्शन लेता हो।
कई बार देखा जाता है कि इस समाज द्वारा आयोजित कार्यक्रम का विषय बौद्धिक वर्ग का है, किंतु उसमें मुख्य अतिथि राजनीतिक वर्ग से है। युवा नेता बनना चाहते है, लेकिन अध्येयता नहीं। अपनी जाति के विधायकों और सांसदों को मसीहा मान लेते हैं। हर कार्यक्रमों में विधायक और सांसद को बुलाते है, कभी यह नहीं हुआ कि कोई एकेडमिक, बिजनेसमैन, टेक्नोक्रेट या इकोनॉमिस्ट की खोज हो।.. कभी नहीं! ऐसे में सिविल सोसाइटी का कैसे होगा?
ऐसी स्थिति में कोई सिविल सोसाइटी उभर नहीं पाती है। आप डॉक्टर हो, पत्रकार हो, वकील हो, आपको भी प्रबुद्ध मान लिया जाता है। जबकि यह प्रोफेशन मात्र है। बुद्धिजीवी के नाम पर अमीरों को बुला लिया जाता है। किसी भी समाज में इनोवेटिव आइडिया वाले लोगों की कमी नहीं है। असल कमी है कि ऐसे लोगों और समाज के बीच संवाद की कमी।
प्रबुद्ध होने का पेशे से उच्चतम होना जरूरी नहीं है। प्रबुद्ध का बहुत अधिक पढ़ा लिखा होना भी जरूरी शर्त नहीं है। प्रबुद्ध वो है जो समाज में परिवर्तन के लिए विचार करता है और उस पर एक्शन लेता है।
किंतु ऐसे लोग समाज के विमर्श को प्रभावित नहीं कर पाते हैं। बहुत सारे लोग डर और संकोच से अपनी बात नहीं रख पाते हैं। क्योंकि उसकी स्वीकार्यता नहीं है। हम चाहते हैं कि यह हिचक टूटे। इस समाज के प्रबुद्ध लोग आगे आए। अपनी बातों और विचारों से समाज को दिशा दें।
दूसरा पहलू यह भी है कि आप कितने भी मेधावी हो, समाज के लिए कितनी भी व्यापक दृष्टि रखते हो.. योगदान देते हो...किंतु समाज आपके साथ नहीं खड़ा होता है, बल्कि लाल बत्ती लगी गाड़ियों के पीछे खड़ा होता है। जब लाल बत्ती वाले देखते हैं कि अंधा हो कर यह तो हमारा ही सुनता है तो अपने तरीके से निर्णय लेते हैं और समाजहित की चिंता नहीं करते हैं। किंतु वोट मांगने के लिए आपके पास समाज के नाम पर चले जाते हैं। इसका नुकसान यह होता है कि वह समाज दोराहे पर होता है।
कोई भी राजनीतिक शक्ति की जड़ में किसी न किसी सामाजिक शक्ति की ताकत होती है। यदि राजनीतिक शक्ति समाजिक शक्ति का मान मर्दन करने लगे तो समाज का दायित्व है कि उस राजनीतिक शक्ति का विकल्प तैयार करें। बरगद के पेड़ों का होना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि बरगद की कीमत जमीन को बंजर हो कर चुकाना नहीं पड़े। यह बात कहने का साहस सिविल सोसाइटी के पास होता है, यह दुर्गेश कुमार कह सकता है। वोटों की तिजारत करने वाले किसी भी शख्स से ऐसा सुनने की उम्मीद मत करिए।
(लेखक सामाजिक चिंतक हैं।)
है कोई जवाब? : किसकी जुबान बोल रहे हैं इस देश के पिछड़े?
Fri, Dec 12, 2025
नवल किशोर कुमार
कोई कितना सभ्य है, यह उसकी जुबान भी तय करती है। हालांकि यह एकमात्र कसौटी नहीं है। लेकिन एक अहम कसौटी तो है ही। मैं इस बात को केंद्रीय अमित शाह से नहीं जोड़ रहा जिन्होंने अभी दो दिन पहले संसद में ‘साला’ शब्द का प्रयोग किया। मैं इस बात बिहार के गृहमंत्री सम्राट चौधरी से नहीं जोड़ रहा, जिनकी उपलब्धि का मूल आधार ही लालू प्रसाद व उनके परिजनों को गालियां देना रहा है। मैं यह सोच रहा हूं कि आखिर इस देश के पिछड़े किसकी जुबान बोल रहे हैं। क्या वजह है कि भाषागत मर्यादाएं बार-बार तोड़ी जा रही हैं। हालत तो यह है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक इस मर्यादा का उल्लंघन करते हैं और सवर्ण मुस्कुराते हैं।
खैर, यह बात केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। आम जनों के जीवन में भी भाषा का असर होता है। मैं तो यह देख रहा हूं कि पूरे देश में संस्कृत को फिर से स्थापित करने की कोशिशें की जा रही हैं। संसद में ‘वंदे मातरम’ के ऊपर चर्चा हुई। मकसद यही कि संस्कृत में रची गई इस कविता को आधुनिक समय में भी प्रासंगिक बनाया जाए। वैसे तो यह बंगाल में होनेवाले चुनाव से प्रेरित लगता है, लेकिन बात केवल यही नहीं है। इसे ऐसे भी समझिए कि मोदी के दिमाग में ‘वंदे मातरम’ की बात आरएसएस के कारण आई। यह आरएसएस ही चाहता है कि इस देश में संस्कृत स्थापित हो, ताकि भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का उसका सपना साकार हो।
वर्ष 2025 आरएसएस की स्थापना का सौवां साल है। इन सौ वर्षों में आरएसएस ने खुद को इतना ताकतवर तो बना ही लिया है कि वह जिसे चाहे उसे इस देश का शासक बना सकता है। उसके लिए पिछड़े वर्ग से आनेवाले मोदी महज प्यादे भर हैं। और इस कारण हैं क्योंकि इस देश में पिछड़ा वर्ग सबसे बड़ा समुदाय है और इसलिए भी कि पिछड़े वर्ग के लोग आपस में बंटे हुए हैं। इनकी कोई सामूहिक पहचान नहीं है। पिछड़ा के रूप में उसकी एक पहचान बन सकती है, जैसा कि डॉ. लोहिया ने कहा था कि ‘पिछड़ा पावे सौ में साठ’। लेकिन डॉ. लोहिया पिछड़ों की बात करते-करते आरएसएस की गोद में खेलने लगे, यह तो अतीत ने देखा है। अतीत ने यह देखा है कि कांग्रेस विरोध की राजनीति के लिए उन्होंने आरएसएस और जनसंघ से भी गुरेज नहीं किया। आज भी नीतीश कुमार, जिन्होंने अपना सियासी सफर समाजवादी के रूप में प्रारंभ किया था, बाद में केवल अपनी जाति और आरएसएस के प्यादे बनकर रह गए हैं। उनके लिए पिछड़ा महज सियासी पत्ता है। कभी किसी जाति को पिछड़ा वर्ग से निकालकर अति पिछड़ा में डाल देते हैं तो कभी किसी अति पिछड़ी जाति को अनुसूचित जाति की सूची में।
असल में आज के पिछड़े सवर्णों की जुबान बोल रहे हैं। और सवर्णों ने अपनी जुबान बदल ली है। सवर्ण चाहते हैं कि पिछड़े संस्कृत पढ़ें, हिंदी पढ़ें और वे स्वयं अंग्रेजी पढ़ें ताकि रोजगार के बेहतर अवसरों पर उनका कब्जा हो। वे पिछड़ों को अंग्रेजी से दूर कर देना चाहते हैं, यह एक तरह से उनके वर्चस्व को बनाए रखने का तरीका है, जिसे पिछड़े समझना ही नहीं चाहते। और थोड़ी बहुत अंग्रेजी जो पिछड़े समाज के बच्चों को पढ़ाई जाती है, उसमें भी षड्यंत्र है। भारतीय अंग्रेजी सवर्णों की अंग्रेजी है। इसके दायरे में पिछड़ा समाज है नहीं।
इसे ऐसे समझिए कि ‘ए’ से ‘एप्पल’ पढ़ाया जाता है जबकि ‘एग्रीकल्चर’ भी पढ़ाया जा सकता है। ऐसे ही जैसे ‘सी’ से ‘काऊ’ पढ़ाया जाता है, वैसे ही ‘बी’ से ‘बॉल’ की जगह ‘बफैलो’ भी पढ़ाया जा सकता है। हिंदी में भी ‘क’ से ‘कबूतर’ के बदले ‘कुदाल’ और ‘ख’ से ‘खरगोश’ के बदले ‘खुरपी’ के बारे में पढ़ाया जा सकता है। लेकिन सवर्ण चाहते ही नहीं हैं कि पिछड़ों का बौद्धिक विकास हो। इसलिए वे पिछड़ों की भाषा और उनकी संस्कृति को उनसे दूर करते रहे हैं। वर्तमान में भी कर रहे हैं और सत्ता के शीर्ष पर काबिज हैं।
कल एक कविता जेहन में आई–
चमार, दुसाध, पासी, यादव,
कुड़मी, नोनिया, बिंद,और
कहारों के खेतों में
कोई देवता खेत नहीं जोतता
कोई देवता बीज नहीं बोता
कोई देवता पानी नहीं पटाता
कोई देवता निकउनी नहीं करता
कोई देवता फसल नहीं काटता
कोई देवता दौनी नहीं करता
कोई देवताइन अनाज नहीं फटकती
कोई देवताइन कोठी नहीं बनाती।
सब काम ये खुद करते हैं
और' पुरखों के 'सवा सेर अनाज' के बदले
ऋण चुकाते हैं।