नीतीश जी जा रहे हैं... : विरह नहीं, राजनीतिक विश्वासघात की दास्तान है यह
गुंजन
यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, एक युग के अवसान का क्षण है। उस शख्स के प्रस्थान का क्षण है जिसने कभी बिखरे, बदनाम और बदहाल बिहार को कानून और विकास की पटरी पर चढ़ाया। लेकिन इस विरह की बेला में सबसे बड़ा प्रश्न सीने को चीरता है।
आखिर क्यों? इतनी बेबसी क्यों? इतनी मजबूरी क्यों?
कहानी आज की नहीं है। इसकी इबारत उसी दिन लिखी जाने लगी थी, जब गृह विभाग उनसे छीनकर सम्राट चौधरी को सौंप दिया गया। वह सिर्फ विभाग परिवर्तन नहीं था। वह दस्तक थी जिसे नीतीश जानकर भी अंजान बने रहे। कभी नरेन्द्र मोदी को बिहार की धरती पर कदम न रखने देने की हुंकार भरने वाले नीतीश आज उसी राजनीति के घेरे में क्यों सिमटते चले गए
क्या यह परिस्थितियों की मार थी या अपने ही लोगों की चाल?
राजनीति के गलियारों में यह फुसफुसाहट तेज है कि नीतीश को बाहर वालों ने नहीं, भीतर वालों ने हराया। वे चेहरे जो साथ खड़े दिखते थे वो भीतर ही भीतर जमीन खिसका रहे थे। सियासी चाणक्य कहे जाने वाले नेता के चारों ओर ऐसे ‘विभीषण’ जमा हो गए, जिन्हें सत्ता षडयंत्र की नई पटकथा लिखनी थी। कहा जाता है कि उनके पुराने साथी आरसीपी सिंह को इस साजिश की आहट पहले ही मिल चुकी थी। वे मिलकर सचेत करना चाहते थे। मगर मुलाकात ही नहीं होने दी गई। पटेल समाज के एक कार्यक्रम में दोनों एक ही मंच पर मौजूद थे। खबर लगी कि आमने-सामने बातचीत हो सकती है तो सुरक्षा का ऐसा पहरा बिठाया गया कि दो पुराने साथी कुछ पल अकेले बैठ भी न सकें। आरसीपी सामने थे, नीतीश सामने थे, लेकिन संवाद की दूरी सत्ता की दूरी से भी बड़ी साबित हुई। क्या यह महज संयोग था या सुनियोजित चुप्पी?
सच यह भी है कि गठबंधनों की लगातार अदला-बदली ने उनके नैतिक आधार को चोट पहुंचाई। लेकिन क्या यह अंत सिर्फ उनकी भूलों का परिणाम है? या फिर सुनियोजित राजनीतिक घेराबंदी का? नीतीश कुमार शारीरिक रूप से आज भले कमजोर हैं, लेकिन यह समय की मार है। मगर, सैद्धांतिक रूप से कमजोर? यह उनकी प्रकृति नहीं थी।
आज वे उस मुहाने पर खड़े दिखते हैं जहाँ से सियासी संध्या साफ दिखाई देती है। पर इतिहास इतना निर्दयी भी नहीं होता। उन्हें याद किया जाएगा, एक ऐसे मुख्यमंत्री के रूप में जिसने कानून-व्यवस्था को मुद्दा बनाया, सड़कों को रफ्तार दी और प्रशासन को जवाबदेह बनाया।
साथ ही यह भी दर्ज होगा कि राजनीति में सबसे घातक वार सामने से नहीं, पीछे से होता है। बुलंदी स्थायी नहीं होती और सत्ता की सबसे ऊंची इमारतें भीतर से खोखली हों तो गिरने में देर नहीं लगती। अगर खुद के आंखों पर भरोसा नहीं कर किसी के कहे पर विश्वास करके फैसले लिए जाएं तो अंत निश्चित है...
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