आज जयंती : महात्मा जोतीराव फुले और हम
Patelon ki Baaten
Sat, Apr 11, 2026
नवल किशोर कुमार
आज महामानव जोतीराव फुले की 199वीं जयंती है। उनका जन्म 11 अप्रैल, 1827 को एक माली परिवार में हुआ था। जयंती के दिन उन्हें याद करने का उद्देश्य यह दर्ज करना है कि सही मायनों में वह सामाजिक न्याय के प्रणेता थे। दुखद यह है कि सामाजिक न्याय को आज केवल ओबीसी का विमर्श मान लिया गया है। यहां तक कि दलित वर्ग भी खुद के लिए सामाजिक न्याय के विमर्श से अलग जोड़कर देखता है।
खैर, यह तो आज की बात है। मैं तो उस कालखंड के बारे में कल्पना कर रहा जब जोतीराव फुले किशोरावस्था में रहे होंगे।आखिर उन्होंने यह क्यों सोचा होगा कि उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले भी पढ़े-लिखे और स्वावलंबी बने? यह सवाल इसलिए कि उस कालखंड में महिलाओं के बारे में ऐसे सोचनेवाले या तो नहीं रहे होंगे या फिर रहे होंगे तो भी उनकी संख्या कम ही होगी। ऐसे में किशोर जोतीराव के मन में ऐसे विचार का आना और उसे अंजाम देना हर किसी के लिए आश्चर्य की बात रही होगी। अब तो इस बारे में पाठ्य सामग्रियां उपलब्ध हैं कि जोतीराव फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले ने किस तरह संघर्ष किया।
दरअसल किसी भी व्यक्तित्व का निर्माण एक दिन में नहीं होता। जीवन में रोज कुछ न कुछ घटनाएं घटित होती हैं, जिनका असर मनुष्य पर पड़ता है और बदलाव होता है। लेकिन जोतीराव फुले के बारे में सोचिए तो लगता है कि वे अलहदा ही रहे। उन्होंने सबसे पहले आधी अबादी की चिंता की। इस जरूरत को समझा कि महिलाओं को अशिक्षित रखकर कोई समाज आगे नहीं बढ़ सकता। उनके लिए समाज का मतलब वर्णाश्रम धर्म पर आधारित समाज नहीं था, जिसमें जाति और लिंग के आधार पर भेद था/है। वह समाज को भेद-रहित बनाना चाहते थे। और यही वजह रही कि 1848 में जब फुले दंपत्ति ने स्कूल खोलने का विचार किया तो वह स्कूल लड़कियों की शिक्षा के लिए था।
जोतीराव फुले की सबसे सुंदर बात यह थी कि वे मानववादी थे। वह जीवन को प्यार करते थे। यही कारण रहा कि उन्होंने विधवाओं के पुनर्विवाह पर जोर दिया। यहां तक कि उनके चिंतन और व्यवहार में ब्राह्मण वर्ग की महिलाएं भी थीं। उन दिनों बेमेल शादियों का दौर हुआ करता था। लड़कियों की उम्र कम होती थी और उनके पतियों की उम्र अधिकांश मामलों में बहुत अधिक। यहां तक कि लोग अपनी पोती की उम्र की लड़कियों से भी विवाह करने से गुरेज नहीं करते थे।
मैं नहीं जानता कि यह कुप्रथा तब शूद्र और अतिशूद्र परिवारों में थी या नहीं। इसकी वजह यह कि अधिकांश उदाहरण जो हमारे पास उपलब्ध हैं, उनमें ब्राह्मण वर्ग के उदाहरण ही अधिक हैं। लेकिन जोतीराव फुले के सामाजिक न्याय का दायरा देखिए कि उसमें ब्राह्मण वर्ग की महिलाएं थीं और फुले दंपत्ति ने स्वजनों के द्वारा बलात्कार पीड़ित ब्राह्मण वर्ग की महिलाओं के लिए आश्रयस्थल का निर्माण किया।
जरा सोचकर देखिए कि उनके लिए ऐसा करना कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा? उनके ऊपर हमले हुए होंगे। ऊंची जाति के लोगों ने उन्हें कितने तरीके से सताया होगा, लेकिन सामाजिक न्याय के प्रति फुले दंपत्ति की प्रतिबद्धता कहा हिसाब लगाइए कि वे एक कदम भी पीछे नहीं हटे।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल अंग्रेजों से लड़ने-भिड़ने या फिर सावरकर के जैसे माफी मांगने तक सीमित नहीं है। यह अलग बात है कि इस देश के इतिहासकारों ने पूरे विमर्श को यहीं तक सीमित रख दिया। वास्तविकता तो यह है कि सामाजिक न्याय की पूरी अवधारणा भारत में केवल और केवल इसलिए स्थान पा सकी, क्योंकि देश में अंग्रेजों का शासन था। इसके पहले का इतिहास देखिए तो भारतीय इतिहास में सामाजिक न्याय का नामोनिशान तक नहीं मिलता।
जोतीराव फुले यह बात अच्छी तरह समझते थे कि यदि समाज में आमूलचुल बदलाव के बीज डालने हैं तो यह सबसे अच्छा समय है। यह बात वे अपनी किताब ‘गुलामगिरी’ (1873) में कहते भी हैं। फुले वह प्रथम व्यक्ति रहे, जिन्होंने शासन-प्रशासन में वंचित समुदायों की समुचित भागीदारी की बात की। लेकिन ऐसा करते हुए उन्होंने यह कभी नहीं चाहा कि ऊंची जातियों की भागीदारी न हो। वे आबादी के अनुपात में भागीदारी चाहते थे।
यह जोतीराव फुले का ही सपना था जिसे 1902 में कोल्हापुर रियासत के राजा शाहूजी महाराज ने अपने राज्य में साकार किया। बाद में अंग्रेजों को भी इसके लिए नीतियां बनानी पड़ीं। फिर साइमन कमीशन का मुख्य लक्ष्य ही भारत में सामाजिक न्याय था, लेकिन सामाजिक अन्यायियों को यह कहां मंजूर था। उन्होंने उसका विरोध किया।
हम चाहे दलित हों या फिर ओबीसी, हमें यह बात आज जोतीराव फुले के प्रति कृतज्ञ हाेकर स्वीकार करना चाहिए कि डॉ. आंबेडकर ने संविधान में आरक्षण का प्रावधान किया ताे उसके पीछे सिर्फ जोतीराव फुले का सामाजिक न्याय था। वह सामाजिक न्याय का असर ही था कि डॉ. लोहिया ने नारा दिया– संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़ा पावै सौ में साठ। हम इसी कड़ी में जगदेव प्रसाद और कांशीराम को भी देख सकते हैं और आज तमिलनाडु तथा बिहार में आरक्षण कोटे में वृद्धि को भी।
असल में सामाजिक न्याय के संघर्ष का दायरा बहुत बड़ा है। इसके प्रस्तावक रहे जोतीराव फुले यह बात समझते थे। वे जानते थे कि इस देश के समाज में दो तरह के लोग रहते हैं। एक वे जो श्रमजीवी हैं, जो कि किसान हैं, शिल्पकार हैं, और जिन्हें ब्राह्मणवाद हाशिए पर रखता है, उनके श्रम को गरिमाहीन बताता है। दूसरा वह वर्ग जो परजीवी है और जो केवल उत्पादों का उपभोग करना जानता है। फुले उनके सांस्कृतिक वर्चस्व को भी समझते थे और यही वजह रही कि जब उन्होंने ‘गुलामगिरी’ की रचना की तब उसमें सबसे पहला प्रहार उन्होंने ब्राह्मणवाद के ऊपर किया। लेकिन उनका उद्देश्य सुस्प्ष्ट था। उन्होंने इस किताब की रचना ब्राह्मणों को अपमानित करने के लिए नहीं, बल्कि अपने लोगों को यह बताने के लिए किया कि समाज क्या है, सामाजिक न्याय क्या है और इसे कैसे हासिल किया जा सकता है।
बहरहाल, आधुनिक भारत के निर्माता महामानव जोतीराव फुले को भारत के अखबारों में याद नहीं किया जाएगा। न तो इस देश की राष्ट्रपति जो कि वैसे तो आदिवासी समाज की हैं, उन्हें याद करेंगीं और न ही इस देश का प्रधानमंत्री जो स्वयं को ओबीसी समाज का साबित करने की हरसंभव कोशिश करता है और ब्राह्मण वर्ग की दलाली करता है।
लेकिन हम और आप इतने कृतघ्न कैसे हो सकते हैं?
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jotiraw fule
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