सामाजिक चिंतन : लड़ाई लड़नी होगी कि पिछड़े वर्ग की जातियां हिंदू नहीं हैं
Tue, Dec 16, 2025
नवल किशोर कुमार
सांस्कृतिक मोर्चे पर हम पिछड़ों की लड़ाई अभी तक मुकम्मल तरीके से प्रारंभ नहीं हो पाई है। हालांकि अपनी मृत्यु से पहले डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म को अपनाकर इस लड़ाई का आगाज जरूर किया, लेकिन इस देश के पिछड़ों ने उसे स्वीकार नहीं किया। हो सकता है कि कुछ अपवाद रहे होंगे, जो दीक्षा भूमि में उस दिन मौजूद रहे होंगे और बाबा साहब के साथ ही बौद्ध धर्म को अपनाया होगा। लेकिन तथ्यों की रोशनी में देखें तो हम यही पाएंगे कि पिछड़ों को डॉ. आंबेडकर का यह आह्वान कि – भले ही हम हिंदू धर्म में जन्मे, लेकिन मरेंगे नहीं – रास नहीं आई। हाल के कुछ दशकों में पिछड़ों के एक छोटे से समूह ने बौद्ध धर्म को अपनाना प्रारंभ किया है। यह समूह अपने आपको सम्राट अशोक से जोड़ता है। बाजदफा तो यह समूह बुद्ध को अपनी जाति का बता देता है। इस तरह से देखें तो पिछड़ों के इस छोटे समूह ने बुद्ध के विचारों को नहीं, उनकी जाति को अपनाया है।
खैर, हम पिछड़े सांस्कृतिक मोर्चे पर किस तरह विफल रहे हैं, इसका अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि ब्राह्मण पिछड़े वर्ग में शामिल दो जातियों – कुर्मी और कोइरी (धानुक व दांगी क्रमश: इनमें शामिल) – को लव और कुश बना दिया। लव और कुश का मतलब राम के बेटे। और आश्चर्य नहीं कि इन जातियों के लोगों ने इसको स्वीकार भी कर लिया। लज्जा भी नहीं आई कि कैसे एक किसान समुदाय काे, जो अपने श्रम के लिए जाना जाता है, को एक ऐसे मिथक से जोड़ दिया गया, जिसके अपने जन्मने की कहानी संदिग्ध है।
यह हम पिछड़ों की सांस्कृतिक मोर्चे पर विफलता ही है कि यादव जाति जो कि एक कर्मठ जाति रही है, मवेशीपालन और कृषि कर्म कर समाज में अपनी भूमिका का निर्वहन करता है, को कृष्ण के मिथक से जोड़ दिया गया है। आज भी मुझे कई ऐसे लोग मिल जाते हैं जो मेरी जाति जानने के बाद ‘जय माधव, जय यादव’ का अभिवादन करते हैं। जबकि कृष्ण का पूरा चरित्र ही ब्राह्मणों की सेवा करने के लिए रचा गया है। हमारे लोग ब्राह्मणों के इस सांस्कृतिक आक्रमण से इस कदर परास्त हुए कि कृष्णवंशी ही बनकर रह गए। आज अपवाद को छोड़ दें तो यादव जाति के किसी नेता में इसका विरोध करने का साहस नहीं है। वे चाहे लालू यादव हों या फिर अखिलेश यादव।
लेकिन मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो ऐसा नहीं है कि हम पिछड़ों ने यह लड़ाई लड़ी ही नहीं। हम लड़े हैं। मैं तो बीसवीं सदी के आरंभ के वर्षों में चले जनेऊ आंदोलन के बारे में सोच रहा हूं। यह भी सोच रहा हूं कि कैसे पिछड़े वर्ग की जातियों ने आगे बढ़कर जनेऊ धारण करना प्रारंभ किया। उनकी सोच यह थी कि यदि वे जनेऊ धारण कर लेंगे तो उन्हें भी हिंदू मान लिया जाएगा, ब्राह्मण उन्हें अपने समकक्ष मानेंगे, सम्मान देंगे और जिस तरह से ब्राह्मणों को कम लगान देना पड़ता है, उन्हें भी कम लगान देना होगा। तब हमारे लोग यादव, कोइरी और कुर्मी नहीं ब्राह्मण बनना चाहते थे। यह एक तरह की लड़ाई ही थी, क्योंकि तब पिछड़े वर्गों के लोगों द्वारा जनेऊ पहनने को ब्राह्मणों और सामंतों ने अपना अपमान माना। उन्होंने सोचा कि अगर ये लोग जनेऊ पहनेंगे तो अपने आपको हमारे जैसा समझने लगेंगे व हमारी बहन-बेटियों का शील उल्लंघन करेंगे। फिर तो जनेऊ आंदोलन के दौरान हमलाें का एक लंबा सिलसिला मिलता है।
उदाहरण के लिए सन् 1899 में पटना जिले के मनेर स्थित हाथीटोला गांव में एक घटना घटित हुई। हाथीटोला यादवों का गांव है और यह आज भी है। उस समय बाबू टीपन प्रसाद सिंह, बाबू द्वारिका सिंह रईस, बाबू जगदीश सिंह, बाबू रामानंद सिंह पहलवान तथा रामप्यारे सिंह ने जनेऊ ग्रहण किया। ये सभी यादव जाति के थे। इनके द्वारा जनेऊ धारण करना ऊंची जातियों के हिंदुओं को बुरा लगा। एक कट्टरपंथी बाबू त्रिवेणी सिंह ने इसके खिलाफ एक विशाल सभा का आयोजन किया। इस सभा में यादव और अन्य जातियों के लोग शामिल हुए। आर्यसमाज के कट्टर विरोधियों – पंडित रायबहादुर दूबे, पंडित भैरवचरण मिश्र आदि को भाषण करने के लिए बुलाया गया। इसकी सूचना जब आर्यसमाजियों को मिली तो वे भी स्वामी ओंकार सच्चिदानंद, स्वामी मुनीश्वरानंद और पंडित रामचंद्र द्विवेदी के साथ सभास्थल पर आए। जब स्वामी ओंकार सच्चिदानंद ने ग्वालों द्वारा जनेऊ धारण करने के पक्ष में बोलना शुरू किया तो मनेर के रायबहादुर दूबे ने जनता में शोर मचाते हुए कहा कि यह साधु नास्तिक है और वे लोगों को भड़काने लगे। फिर उन्होंने जनता को स्वामीजी पर प्रहार करने का इशारा किया। कुछ लोग ताबड़तोड़ लाठी चलाने लगे। स्वामी जी के सिर में चोट लगी, काफी खून बहा। फिर भी उन्होंने आक्रमणकारियों पर मुकदमा करने से इंकार कर दिया।
एक घटना तत्कालीन मुंगेर कमिश्नरी के लाखोचक में घटित हुई थी। बड़ी संख्या में पिछड़े समाज के लोग जनेऊ घारण करने को एकजुट हुए। तभी ब्राह्मणों और सामंतों ने उनके ऊपर हमला कर दिया। दर्जनों घायल हुए। मामला इतना बढ़ा कि उस समय की ब्रिटिश पुलिस को इस दौरान 118 राऊंड गोलिया चलानी पड़ी थीं। इसमें भूमिहार और यादव जाति के लोग मारे गए।
इतना ही नहीं, वर्ष 1930 का दशक तो क्रांति का दशक साबित हुआ जब सरदार जगदेव सिंह यादव, शिवपूजन सिंह और जेएनपी मेहता ने मिलकर त्रिवेणी संघ का गठन किया। यह एक राजनीतिक संगठन था, जिसने सांस्कृतिक मोर्चा भी संभाला। सरदार जगदेव सिंह यादव को इस संगठन की माता कहा जाता है। लेकिन यह त्रिवेणी संघ रूपी यह मोर्चा अधिक दिनों तक खुद को नहीं संभाल सका और राजनीतिक स्वार्थों के कारण बिखर गया।
एक अहम प्रयास महामना रामस्वरूप वर्मा ने अर्जक संघ बनाकर किया। यह संघ आज भी है, लेकिन इसकी भी सीमाएं सामने आई हैं और अब यह बहुत हद तक सीमित हो गया। इसके बावजूद इस संघ ने एक राह दिखाई है कि कैसे हम पिछड़े अपनी सांस्कृतिक लड़ाई लड़ें। संघ आज भी लड़ रहा है कि बिना ब्राह्मण के शादी-विवाह हों, श्राद्ध भोज और पिंड तर्पण करने जैसे पाखंडों का विरोध करें। इसका विस्तार करने की आवश्यकता है। और यह लड़ाई ऐसे ही लड़ी जा सकती है।
बहरहाल, आज की बात करें तो इस देश के ब्राह्मण और बनियों ने सांस्कृतिक लड़ाई को लगभग जीत लिया है। कल से देश भर में चर्चा है कि मनरेगा योजना के नाम में से महात्मा गांधी का नाम हटाकर ‘जी राम जी’ जोड़ दिया जाएगा। मुमकिन है कि आज लोकसभा में इसके लिए एक विधेयक भी लाया जाएगा और इसकी पूरी संभावना है कि यह पारित भी हो जाएगा, क्योंकि लोकसभा में सत्ता पक्ष के पास पर्याप्त नरमुंड हैं, जिनका काम केवल हां में हां मिलाना है। ये नरमुंड दलित और पिछड़ों के भी हैं, जिन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि ब्राह्मणों और बनियों ने 85 फीसदी समुदायों सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक अस्तित्व को बंधक बना लिया है।
मैं फिर कहता हूं कि सांस्कृतिक मोर्चे पर हम पिछड़ों की लड़ाई अभी तक मुकम्मल तरीके से प्रारंभ नहीं हो पाई है। लेकिन हमें यह लड़ाई लड़नी ही होगी और जीतनी होगी। कल ही मेरी जेहन में यह कविता आई–
सुनो यादवो,
कोइरियो, कुर्मियो, कहारो, बिंदो, हजामो और मल्लाहो,
सब सुनो।
आज जो तुम
खुद को हिंदू कहते हो
और ब्राह्मणों के कहने पर
किसी की गर्दन उतारने को उतारू रहते हो,
एक दिन जनेऊ पहन कर देखो
ब्राह्मण तुम्हारी गर्दन उतार देंगे।
पुण्यतिथि पर विशेष : आज फिर जरूरत है बारदोली के सरदार की
Mon, Dec 15, 2025
गुंजन
बात तब की है जब भारत में अंग्रेजों का शासन था, अंग्रेजी हुकुमत न जाने कितने जुल्म ढाती थी। उसने किसानों को भी नहीं छोड़ा था, जब मन हो टैक्स लगाना, अपने अनुसार फसल का दाम लगाना, समय पर फसलों के दाम नहीं देना और अपनी मर्जी से टैक्स लगाना तो आम बात ही थी। उसी समय बारदोली ताल्लुके की जमाबंदी में लगभग 30% मालगुजारी बढ़ा दी गई दी गई थी, यह घटना सन् 1928 ई. की है। इस प्रकार की बढ़ोतरी से किसानों ने तंग आकर अंग्रेजी सरकार के खिलाफ आंदोलन करना शुरू कर दिया। अतएव बारदोली किसान सत्याग्रह का कारण बना अंग्रेजी सरकार का लालच। उनके अति उत्साही पदाधिकारियों जिनमें भारतीय अफसर भी थे; लगातार लगान बढ़ाने का कार्य किया। राजस्व की मांग मांग इन क्षेत्रों में लगातार बढ़ती रहती थी। बंबई विधान परिषद ने सन् 1924 और 1927 ई. में दो बार बढ़े हुए लगान की वसूली के वसूली के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया था। सरकार ने बारदोली में लगान बढ़ाया और उसे सख्ती से सख्ती से बढ़ाया और उसे सख्ती से से वसूली करने का कड़ा निर्णय भी ले लिया।
बारदोली का ताल्लुका सूरत जिले में है जो बड़ा ही रमणीय प्रदेश है। बारदोली गुजरात उद्दान की सुंदर वाटिका का खिला हुआ गुलशन है। कोसों तक हरे-भरे खेत लहराते लहराते हैं जगह-जगह पर आमों के झुंड खड़े हैं।
सन 1921 ई. से पूर्व किसी ने बारदोली बारदोली ने बारदोली का नाम भी नहीं सुना था। आज बारदोली की कीर्ति दूर-दूर तक फैली हुई है। किसानों तथा पिछड़ी हुई जातियों के बल पर देश में कोई इतना बड़ा आंदोलन नहीं हुआ। बारदोली ने देश को अनुभव करा दिया कि ग्राम संगठन के बल पर किस प्रकार असंभव बात भी संभव हो सकती है।
बारदोली का ताल्लुका 20 मील लम्बा और लगभग इतना ही चौड़ा है। इसकी जमीन भी बड़ी उपजाऊ है। ताप्ती, मिठोला तथा पूर्णा इन तीनों बड़ी नदियों के अतिरिक्त और भी कई छोटी नदियां बहती हैं। बारदोली के ताल्लुके में छोटे-बड़े लगभग सवा सौ गांव थे। इन सब की की जनसंख्या उन दिनों करीब 87000 थी। उत्तर में ताप्ती नदी बहती है, पूरब और पश्चिम में बड़ौदा राज्य है। पूरब की अपेक्षा पश्चिम की धरती अधिक उपजाऊ है। पश्चिम की धरती अच्छी है और मिट्टी काली है। वहाँ कपास, ज्वार और चावल इत्यादि उपजते हैं।
आजकल यहाँ की जनता दो भागों में बंटी है। एक उजली परज और दूसरी काली परज अथवा रानी परज। और भी कई जातियाँ यहाँ रहती है किंतु यहाँ 'कणबी' जाति की प्रधानता है, जो कुर्मी क्षत्रियों की एक शाखा है। यह बड़ी स्वाभिमानी, परिश्रमी तथा आन पर मिटने वाली जाति है। यह कणबी जाति 1921ई. में महात्मा गांधी के समक्ष दो प्रतिज्ञाएँ की थी:-
१. विदेशी कपड़ा न खरीदने का
२. अछूतोद्धार की
तभी से महात्मा गांधी ने वहाँ खद्दर और चर्खे का खूब प्रचार किया। अब यह जाति जाग उठी थी। कहा कि सत्याग्रह का आरंभ सूरत से होना चाहिए क्योंकि अंग्रेजों ने यहीं से अपनी उन्नति शुरू की थी। अतः इसी मार्ग से उन्हें विदा कर प्रायश्चित करने का अवसर सूरत को दिया जाना चाहिए, यह दलील काम कर गई। सत्याग्रह का शंखनाद गूंज उठा। वायसराय को चुनौती दे दी गई और घोषणा की कि केवल 22% ही मालगुजारी की वृद्धि की जाएगी। इस प्रकार बारदोली की मालगुजारी 5,14,762 रूपए से बढ़कर 6,20,000 रुपए हो गई। इसका बड़ा लाभ पैसों के रूप में नहीं था, हालांकि उस समय की दृष्टि से यह नगण्य भी नहीं था। इसने राष्ट्र में स्तर को ऊँचा उठा दिया, लेकिन किसानों की आर्थिक दशा पहले से ही गिरी हुई थी। इधर बढ़ी हुई मालगुजारी का बोझ उनके माथे पर पड़ गया। किसानों ने सरदार के साथ सहयोग करने की भावना से इस बढ़े हुए लगाम के प्रश्न को बम्बई धारा सभा के अपने प्रतिनिधि राय बहादुर भीम भाई नायक तथा राव बहादुर दादूभाई देसाई के द्वारा बम्बई सरकार के सामने रखा। किंतु इसका कोई परिणाम नहीं निकला। तब बारदोली की जनता को अपने सेनापति बल्लभ भाई पटेल की याद आई।
बारदोली कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने इस प्रश्न को सरदार पटेल के सामने रखा। बल्लभ भाई पटेल इस समय गुजरात के भीषण बाढ़ संकट के निवारण में लगे हुए थे। परंतु वह बारदोली के किसानों को भी निराश नहीं करना चाहते थे। अतः उन्होंने बारदोली कांग्रेस को यह आज्ञा दी कि वह बढ़े हुए लगान की विस्तृत जांच कर अपनी रपट दे और इस बात की भी रपट दें कि इसका प्रतिकार करने के लिए कहां तक तैयार हैं। जांच रपट मिलने पर 4 फरवरी 1928 को सरदार गए। उन्होंने वहां एक सभा में सीधा प्रश्न किया कि प्रतिरोध के लिए वह कहाँ तक तैयार हैं। इस सभा में उन्होंने कष्टों का वर्णन किया, जो सत्याग्रह के कारण आ सकते थे। उन्होंने सभा में यह भी कहा कि "मेरे साथ खेल न किया जाए, मैं ऐसे कामों में हाथ नहीं डालता जिसमें जोखिम ना हो। जो लोग जोखिम लेने को तैयार हैं मैं उनका साथ दूंगा, जनता तैयार थी।
और आप एक मात्र अस्त्र सत्याग्रह का ही बाकी रहा। सरदार ने इन दिनों बहुत परिश्रम किया। वे गांव-गांव पहुंच कर किसानों को सत्य एवं अहिंसा के सिद्धांतों को समझाते थे। उनके भाषण बड़े ही स्पष्ट एवं हृदयग्राही होते थे। वे लोगों की मौन आत्मा में खलबली मचा देते थे। सरदार कभी बारदोली में गर्जना करते तो रातों-रात दूसरे गांव पहुंच जाते और आप और भीड़ में उनका भाषण होता। इस चमत्कार का वर्णन करते हुए बम्बई के एक नेता ने बम्बई की एक सार्वजनिक सभा में उन्हें 'सरदार' कह कर पुकारा गांधीजी को उनका नाम पसंद आया।
सरदार पटेल की यथार्थ एवं ठोस कार्यशैली का किसानों पर अच्छा प्रभाव पड़ा। महादेव देसाई ने लिखा है- "किसानों की भाषा एवं मुहावरे से भली-भांति परिचित होने के कारण उनके मन को उद्वेलित करने वाले भाषणों ने किसानों को अभिभूत कर दिया" आदिवासियों ने मद्दपान करना छोड़ दिया। महिलाओं ने पीतल के भारी गहने पहनना छोड़कर खादी और चर्खे को अपना लिया। गांव-गांव में सत्याग्रह के गीत गूंजने लगे। बड़ी-बड़ी जन सभाएं हुई। संपत्ति की जब्ती-कुर्की, नीलामी, झूठे मुकदमे और जेल की सजा आदि से भी किसान हतोत्साहित नहीं हुए। गांव वालों ने कुर्की करवाने वाले अफसरों के तरीकों को बेकार बनाने वाली कई उक्तियां खोज निकाली। बेगार की प्रथा को किसानों ने खत्म कर दिया।
स्वयंसेवकों के अथक एवं नि:स्वार्थ सेवा का आम जनता पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा। कतिपय सभ्रांत महिलाएं भी खादी पहनने लगी तथा खादी का प्रचार करने लगी। लोगों को इससे बड़ी प्रेरणा मिली। हृदयनाथ कुंजराव, एस.जी. बझे और दूसरे निष्पक्ष पर्यवेक्षकों ने बारीकी से इस समस्या का अध्ययन करके सत्याग्रह यों की मांगों को उचित ठहराया। इससे सत्याग्रह का नैतिक पक्ष उजागर हुआ।
है कोई जवाब? : किसकी जुबान बोल रहे हैं इस देश के पिछड़े?
Fri, Dec 12, 2025
नवल किशोर कुमार
कोई कितना सभ्य है, यह उसकी जुबान भी तय करती है। हालांकि यह एकमात्र कसौटी नहीं है। लेकिन एक अहम कसौटी तो है ही। मैं इस बात को केंद्रीय अमित शाह से नहीं जोड़ रहा जिन्होंने अभी दो दिन पहले संसद में ‘साला’ शब्द का प्रयोग किया। मैं इस बात बिहार के गृहमंत्री सम्राट चौधरी से नहीं जोड़ रहा, जिनकी उपलब्धि का मूल आधार ही लालू प्रसाद व उनके परिजनों को गालियां देना रहा है। मैं यह सोच रहा हूं कि आखिर इस देश के पिछड़े किसकी जुबान बोल रहे हैं। क्या वजह है कि भाषागत मर्यादाएं बार-बार तोड़ी जा रही हैं। हालत तो यह है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक इस मर्यादा का उल्लंघन करते हैं और सवर्ण मुस्कुराते हैं।
खैर, यह बात केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। आम जनों के जीवन में भी भाषा का असर होता है। मैं तो यह देख रहा हूं कि पूरे देश में संस्कृत को फिर से स्थापित करने की कोशिशें की जा रही हैं। संसद में ‘वंदे मातरम’ के ऊपर चर्चा हुई। मकसद यही कि संस्कृत में रची गई इस कविता को आधुनिक समय में भी प्रासंगिक बनाया जाए। वैसे तो यह बंगाल में होनेवाले चुनाव से प्रेरित लगता है, लेकिन बात केवल यही नहीं है। इसे ऐसे भी समझिए कि मोदी के दिमाग में ‘वंदे मातरम’ की बात आरएसएस के कारण आई। यह आरएसएस ही चाहता है कि इस देश में संस्कृत स्थापित हो, ताकि भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का उसका सपना साकार हो।
वर्ष 2025 आरएसएस की स्थापना का सौवां साल है। इन सौ वर्षों में आरएसएस ने खुद को इतना ताकतवर तो बना ही लिया है कि वह जिसे चाहे उसे इस देश का शासक बना सकता है। उसके लिए पिछड़े वर्ग से आनेवाले मोदी महज प्यादे भर हैं। और इस कारण हैं क्योंकि इस देश में पिछड़ा वर्ग सबसे बड़ा समुदाय है और इसलिए भी कि पिछड़े वर्ग के लोग आपस में बंटे हुए हैं। इनकी कोई सामूहिक पहचान नहीं है। पिछड़ा के रूप में उसकी एक पहचान बन सकती है, जैसा कि डॉ. लोहिया ने कहा था कि ‘पिछड़ा पावे सौ में साठ’। लेकिन डॉ. लोहिया पिछड़ों की बात करते-करते आरएसएस की गोद में खेलने लगे, यह तो अतीत ने देखा है। अतीत ने यह देखा है कि कांग्रेस विरोध की राजनीति के लिए उन्होंने आरएसएस और जनसंघ से भी गुरेज नहीं किया। आज भी नीतीश कुमार, जिन्होंने अपना सियासी सफर समाजवादी के रूप में प्रारंभ किया था, बाद में केवल अपनी जाति और आरएसएस के प्यादे बनकर रह गए हैं। उनके लिए पिछड़ा महज सियासी पत्ता है। कभी किसी जाति को पिछड़ा वर्ग से निकालकर अति पिछड़ा में डाल देते हैं तो कभी किसी अति पिछड़ी जाति को अनुसूचित जाति की सूची में।
असल में आज के पिछड़े सवर्णों की जुबान बोल रहे हैं। और सवर्णों ने अपनी जुबान बदल ली है। सवर्ण चाहते हैं कि पिछड़े संस्कृत पढ़ें, हिंदी पढ़ें और वे स्वयं अंग्रेजी पढ़ें ताकि रोजगार के बेहतर अवसरों पर उनका कब्जा हो। वे पिछड़ों को अंग्रेजी से दूर कर देना चाहते हैं, यह एक तरह से उनके वर्चस्व को बनाए रखने का तरीका है, जिसे पिछड़े समझना ही नहीं चाहते। और थोड़ी बहुत अंग्रेजी जो पिछड़े समाज के बच्चों को पढ़ाई जाती है, उसमें भी षड्यंत्र है। भारतीय अंग्रेजी सवर्णों की अंग्रेजी है। इसके दायरे में पिछड़ा समाज है नहीं।
इसे ऐसे समझिए कि ‘ए’ से ‘एप्पल’ पढ़ाया जाता है जबकि ‘एग्रीकल्चर’ भी पढ़ाया जा सकता है। ऐसे ही जैसे ‘सी’ से ‘काऊ’ पढ़ाया जाता है, वैसे ही ‘बी’ से ‘बॉल’ की जगह ‘बफैलो’ भी पढ़ाया जा सकता है। हिंदी में भी ‘क’ से ‘कबूतर’ के बदले ‘कुदाल’ और ‘ख’ से ‘खरगोश’ के बदले ‘खुरपी’ के बारे में पढ़ाया जा सकता है। लेकिन सवर्ण चाहते ही नहीं हैं कि पिछड़ों का बौद्धिक विकास हो। इसलिए वे पिछड़ों की भाषा और उनकी संस्कृति को उनसे दूर करते रहे हैं। वर्तमान में भी कर रहे हैं और सत्ता के शीर्ष पर काबिज हैं।
कल एक कविता जेहन में आई–
चमार, दुसाध, पासी, यादव,
कुड़मी, नोनिया, बिंद,और
कहारों के खेतों में
कोई देवता खेत नहीं जोतता
कोई देवता बीज नहीं बोता
कोई देवता पानी नहीं पटाता
कोई देवता निकउनी नहीं करता
कोई देवता फसल नहीं काटता
कोई देवता दौनी नहीं करता
कोई देवताइन अनाज नहीं फटकती
कोई देवताइन कोठी नहीं बनाती।
सब काम ये खुद करते हैं
और' पुरखों के 'सवा सेर अनाज' के बदले
ऋण चुकाते हैं।