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सुचना

सामाजिक चिंतन : लड़ाई लड़नी होगी कि पिछड़े वर्ग की जातियां हिंदू नहीं हैं

Patelon ki Baaten

Tue, Dec 16, 2025

नवल किशोर कुमार

सांस्कृतिक मोर्चे पर हम पिछड़ों की लड़ाई अभी तक मुकम्मल तरीके से प्रारंभ नहीं हो पाई है। हालांकि अपनी मृत्यु से पहले डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म को अपनाकर इस लड़ाई का आगाज जरूर किया, लेकिन इस देश के पिछड़ों ने उसे स्वीकार नहीं किया। हो सकता है कि कुछ अपवाद रहे होंगे, जो दीक्षा भूमि में उस दिन मौजूद रहे होंगे और बाबा साहब के साथ ही बौद्ध धर्म को अपनाया होगा। लेकिन तथ्यों की रोशनी में देखें तो हम यही पाएंगे कि पिछड़ों को डॉ. आंबेडकर का यह आह्वान कि – भले ही हम हिंदू धर्म में जन्मे, लेकिन मरेंगे नहीं – रास नहीं आई। हाल के कुछ दशकों में पिछड़ों के एक छोटे से समूह ने बौद्ध धर्म को अपनाना प्रारंभ किया है। यह समूह अपने आपको सम्राट अशोक से जोड़ता है। बाजदफा तो यह समूह बुद्ध को अपनी जाति का बता देता है। इस तरह से देखें तो पिछड़ों के इस छोटे समूह ने बुद्ध के विचारों को नहीं, उनकी जाति को अपनाया है।

खैर, हम पिछड़े सांस्कृतिक मोर्चे पर किस तरह विफल रहे हैं, इसका अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि ब्राह्मण पिछड़े वर्ग में शामिल दो जातियों – कुर्मी और कोइरी (धानुक व दांगी क्रमश: इनमें शामिल) – को लव और कुश बना दिया। लव और कुश का मतलब राम के बेटे। और आश्चर्य नहीं कि इन जातियों के लोगों ने इसको स्वीकार भी कर लिया। लज्जा भी नहीं आई कि कैसे एक किसान समुदाय काे, जो अपने श्रम के लिए जाना जाता है, को एक ऐसे मिथक से जोड़ दिया गया, जिसके अपने जन्मने की कहानी संदिग्ध है।

यह हम पिछड़ों की सांस्कृतिक मोर्चे पर विफलता ही है कि यादव जाति जो कि एक कर्मठ जाति रही है, मवेशीपालन और कृषि कर्म कर समाज में अपनी भूमिका का निर्वहन करता है, को कृष्ण के मिथक से जोड़ दिया गया है। आज भी मुझे कई ऐसे लोग मिल जाते हैं जो मेरी जाति जानने के बाद ‘जय माधव, जय यादव’ का अभिवादन करते हैं। जबकि कृष्ण का पूरा चरित्र ही ब्राह्मणों की सेवा करने के लिए रचा गया है। हमारे लोग ब्राह्मणों के इस सांस्कृतिक आक्रमण से इस कदर परास्त हुए कि कृष्णवंशी ही बनकर रह गए। आज अपवाद को छोड़ दें तो यादव जाति के किसी नेता में इसका विरोध करने का साहस नहीं है। वे चाहे लालू यादव हों या फिर अखिलेश यादव।

लेकिन मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो ऐसा नहीं है कि हम पिछड़ों ने यह लड़ाई लड़ी ही नहीं। हम लड़े हैं। मैं तो बीसवीं सदी के आरंभ के वर्षों में चले जनेऊ आंदोलन के बारे में सोच रहा हूं। यह भी सोच रहा हूं कि कैसे पिछड़े वर्ग की जातियों ने आगे बढ़कर जनेऊ धारण करना प्रारंभ किया। उनकी सोच यह थी कि यदि वे जनेऊ धारण कर लेंगे तो उन्हें भी हिंदू मान लिया जाएगा, ब्राह्मण उन्हें अपने समकक्ष मानेंगे, सम्मान देंगे और जिस तरह से ब्राह्मणों को कम लगान देना पड़ता है, उन्हें भी कम लगान देना होगा। तब हमारे लोग यादव, कोइरी और कुर्मी नहीं ब्राह्मण बनना चाहते थे। यह एक तरह की लड़ाई ही थी, क्योंकि तब पिछड़े वर्गों के लोगों द्वारा जनेऊ पहनने को ब्राह्मणों और सामंतों ने अपना अपमान माना। उन्होंने सोचा कि अगर ये लोग जनेऊ पहनेंगे तो अपने आपको हमारे जैसा समझने लगेंगे व हमारी बहन-बेटियों का शील उल्लंघन करेंगे। फिर तो जनेऊ आंदोलन के दौरान हमलाें का एक लंबा सिलसिला मिलता है।

उदाहरण के लिए सन् 1899 में पटना जिले के मनेर स्थित हाथीटोला गांव में एक घटना घटित हुई। हाथीटोला यादवों का गांव है और यह आज भी है। उस समय बाबू टीपन प्रसाद सिंह, बाबू द्वारिका सिंह रईस, बाबू जगदीश सिंह, बाबू रामानंद सिंह पहलवान तथा रामप्यारे सिंह ने जनेऊ ग्रहण किया। ये सभी यादव जाति के थे। इनके द्वारा जनेऊ धारण करना ऊंची जातियों के हिंदुओं को बुरा लगा। एक कट्टरपंथी बाबू त्रिवेणी सिंह ने इसके खिलाफ एक विशाल सभा का आयोजन किया। इस सभा में यादव और अन्य जातियों के लोग शामिल हुए। आर्यसमाज के कट्टर विरोधियों – पंडित रायबहादुर दूबे, पंडित भैरवचरण मिश्र आदि को भाषण करने के लिए बुलाया गया। इसकी सूचना जब आर्यसमाजियों को मिली तो वे भी स्वामी ओंकार सच्चिदानंद, स्वामी मुनीश्वरानंद और पंडित रामचंद्र द्विवेदी के साथ सभास्थल पर आए। जब स्वामी ओंकार सच्चिदानंद ने ग्वालों द्वारा जनेऊ धारण करने के पक्ष में बोलना शुरू किया तो मनेर के रायबहादुर दूबे ने जनता में शोर मचाते हुए कहा कि यह साधु नास्तिक है और वे लोगों को भड़काने लगे। फिर उन्होंने जनता को स्वामीजी पर प्रहार करने का इशारा किया। कुछ लोग ताबड़तोड़ लाठी चलाने लगे। स्वामी जी के सिर में चोट लगी, काफी खून बहा। फिर भी उन्होंने आक्रमणकारियों पर मुकदमा करने से इंकार कर दिया।

एक घटना तत्कालीन मुंगेर कमिश्नरी के लाखोचक में घटित हुई थी। बड़ी संख्या में पिछड़े समाज के लोग जनेऊ घारण करने को एकजुट हुए। तभी ब्राह्मणों और सामंतों ने उनके ऊपर हमला कर दिया। दर्जनों घायल हुए। मामला इतना बढ़ा कि उस समय की ब्रिटिश पुलिस को इस दौरान 118 राऊंड गोलिया चलानी पड़ी थीं। इसमें भूमिहार और यादव जाति के लोग मारे गए।

इतना ही नहीं, वर्ष 1930 का दशक तो क्रांति का दशक साबित हुआ जब सरदार जगदेव सिंह यादव, शिवपूजन सिंह और जेएनपी मेहता ने मिलकर त्रिवेणी संघ का गठन किया। यह एक राजनीतिक संगठन था, जिसने सांस्कृतिक मोर्चा भी संभाला। सरदार जगदेव सिंह यादव को इस संगठन की माता कहा जाता है। लेकिन यह त्रिवेणी संघ रूपी यह मोर्चा अधिक दिनों तक खुद को नहीं संभाल सका और राजनीतिक स्वार्थों के कारण बिखर गया।

एक अहम प्रयास महामना रामस्वरूप वर्मा ने अर्जक संघ बनाकर किया। यह संघ आज भी है, लेकिन इसकी भी सीमाएं सामने आई हैं और अब यह बहुत हद तक सीमित हो गया। इसके बावजूद इस संघ ने एक राह दिखाई है कि कैसे हम पिछड़े अपनी सांस्कृतिक लड़ाई लड़ें। संघ आज भी लड़ रहा है कि बिना ब्राह्मण के शादी-विवाह हों, श्राद्ध भोज और पिंड तर्पण करने जैसे पाखंडों का विरोध करें। इसका विस्तार करने की आवश्यकता है। और यह लड़ाई ऐसे ही लड़ी जा सकती है।

बहरहाल, आज की बात करें तो इस देश के ब्राह्मण और बनियों ने सांस्कृतिक लड़ाई को लगभग जीत लिया है। कल से देश भर में चर्चा है कि मनरेगा योजना के नाम में से महात्मा गांधी का नाम हटाकर ‘जी राम जी’ जोड़ दिया जाएगा। मुमकिन है कि आज लोकसभा में इसके लिए एक विधेयक भी लाया जाएगा और इसकी पूरी संभावना है कि यह पारित भी हो जाएगा, क्योंकि लोकसभा में सत्ता पक्ष के पास पर्याप्त नरमुंड हैं, जिनका काम केवल हां में हां मिलाना है। ये नरमुंड दलित और पिछड़ों के भी हैं, जिन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि ब्राह्मणों और बनियों ने 85 फीसदी समुदायों सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक अस्तित्व को बंधक बना लिया है।

मैं फिर कहता हूं कि सांस्कृतिक मोर्चे पर हम पिछड़ों की लड़ाई अभी तक मुकम्मल तरीके से प्रारंभ नहीं हो पाई है। लेकिन हमें यह लड़ाई लड़नी ही होगी और जीतनी होगी। कल ही मेरी जेहन में यह कविता आई–

सुनो यादवो,

कोइरियो, कुर्मियो, कहारो, बिंदो, हजामो और मल्लाहो,

सब सुनो।

आज जो तुम

खुद को हिंदू कहते हो

और ब्राह्मणों के कहने पर

किसी की गर्दन उतारने को उतारू रहते हो,

एक दिन जनेऊ पहन कर देखो

ब्राह्मण तुम्हारी गर्दन उतार देंगे।

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