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सुचना

पुण्यतिथि पर विशेष : आज फिर जरूरत है बारदोली के सरदार की

Patelon ki Baaten

Mon, Dec 15, 2025

गुंजन

बात तब की है जब भारत में अंग्रेजों का शासन था, अंग्रेजी हुकुमत न जाने कितने जुल्म ढाती थी। उसने किसानों को भी नहीं छोड़ा था, जब मन हो टैक्स लगाना, अपने अनुसार फसल का दाम लगाना, समय पर फसलों के दाम नहीं देना और अपनी मर्जी से टैक्स लगाना तो आम बात ही थी। उसी समय बारदोली ताल्लुके की जमाबंदी में लगभग 30% मालगुजारी बढ़ा दी गई दी गई थी, यह घटना सन् 1928 ई. की है। इस प्रकार की बढ़ोतरी से किसानों ने तंग आकर अंग्रेजी सरकार के खिलाफ आंदोलन करना शुरू कर दिया। अतएव बारदोली किसान सत्याग्रह का कारण बना अंग्रेजी सरकार का लालच। उनके अति उत्साही पदाधिकारियों जिनमें भारतीय अफसर भी थे; लगातार लगान बढ़ाने का कार्य किया। राजस्व की मांग मांग इन क्षेत्रों में लगातार बढ़ती रहती थी। बंबई विधान परिषद ने सन् 1924 और 1927 ई. में दो बार बढ़े हुए लगान की वसूली के वसूली के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया था। सरकार ने बारदोली में लगान बढ़ाया और उसे सख्ती से सख्ती से बढ़ाया और उसे सख्ती से से वसूली करने का कड़ा निर्णय भी ले लिया।

बारदोली का ताल्लुका सूरत जिले में है जो बड़ा ही रमणीय प्रदेश है। बारदोली गुजरात उद्दान की सुंदर वाटिका का खिला हुआ गुलशन है। कोसों तक हरे-भरे खेत लहराते लहराते हैं जगह-जगह पर आमों के झुंड खड़े हैं।

सन 1921 ई. से पूर्व किसी ने बारदोली बारदोली ने बारदोली का नाम भी नहीं सुना था। आज बारदोली की कीर्ति दूर-दूर तक फैली हुई है। किसानों तथा पिछड़ी हुई जातियों के बल पर देश में कोई इतना बड़ा आंदोलन नहीं हुआ। बारदोली ने देश को अनुभव करा दिया कि ग्राम संगठन के बल पर किस प्रकार असंभव बात भी संभव हो सकती है।

बारदोली का ताल्लुका 20 मील लम्बा और लगभग इतना ही चौड़ा है। इसकी जमीन भी बड़ी उपजाऊ है। ताप्ती, मिठोला तथा पूर्णा इन तीनों बड़ी नदियों के अतिरिक्त और भी कई छोटी नदियां बहती हैं। बारदोली के ताल्लुके में छोटे-बड़े लगभग सवा सौ गांव थे। इन सब की की जनसंख्या उन दिनों करीब 87000 थी। उत्तर में ताप्ती नदी बहती है, पूरब और पश्चिम में बड़ौदा राज्य है। पूरब की अपेक्षा पश्चिम की धरती अधिक उपजाऊ है। पश्चिम की धरती अच्छी है और मिट्टी काली है। वहाँ कपास, ज्वार और चावल इत्यादि उपजते हैं।

आजकल यहाँ की जनता दो भागों में बंटी है। एक उजली परज और दूसरी काली परज अथवा रानी परज। और भी कई जातियाँ यहाँ रहती है किंतु यहाँ 'कणबी' जाति की प्रधानता है, जो कुर्मी क्षत्रियों की एक शाखा है। यह बड़ी स्वाभिमानी, परिश्रमी तथा आन पर मिटने वाली जाति है। यह कणबी जाति 1921ई. में महात्मा गांधी के समक्ष दो प्रतिज्ञाएँ की थी:-

१. विदेशी कपड़ा न खरीदने का

२. अछूतोद्धार की

तभी से महात्मा गांधी ने वहाँ खद्दर और चर्खे का खूब प्रचार किया। अब यह जाति जाग उठी थी। कहा कि सत्याग्रह का आरंभ सूरत से होना चाहिए क्योंकि अंग्रेजों ने यहीं से अपनी उन्नति शुरू की थी। अतः इसी मार्ग से उन्हें विदा कर प्रायश्चित करने का अवसर सूरत को दिया जाना चाहिए, यह दलील काम कर गई। सत्याग्रह का शंखनाद गूंज उठा। वायसराय को चुनौती दे दी गई और घोषणा की कि केवल 22% ही मालगुजारी की वृद्धि की जाएगी। इस प्रकार बारदोली की मालगुजारी 5,14,762 रूपए से बढ़कर 6,20,000 रुपए हो गई। इसका बड़ा लाभ पैसों के रूप में नहीं था, हालांकि उस समय की दृष्टि से यह नगण्य भी नहीं था। इसने राष्ट्र में स्तर को ऊँचा उठा दिया, लेकिन किसानों की आर्थिक दशा पहले से ही गिरी हुई थी। इधर बढ़ी हुई मालगुजारी का बोझ उनके माथे पर पड़ गया। किसानों ने सरदार के साथ सहयोग करने की भावना से इस बढ़े हुए लगाम के प्रश्न को बम्बई धारा सभा के अपने प्रतिनिधि राय बहादुर भीम भाई नायक तथा राव बहादुर दादूभाई देसाई के द्वारा बम्बई सरकार के सामने रखा। किंतु इसका कोई परिणाम नहीं निकला। तब बारदोली की जनता को अपने सेनापति बल्लभ भाई पटेल की याद आई।

बारदोली कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने इस प्रश्न को सरदार पटेल के सामने रखा। बल्लभ भाई पटेल इस समय गुजरात के भीषण बाढ़ संकट के निवारण में लगे हुए थे। परंतु वह बारदोली के किसानों को भी निराश नहीं करना चाहते थे। अतः उन्होंने बारदोली कांग्रेस को यह आज्ञा दी कि वह बढ़े हुए लगान की विस्तृत जांच कर अपनी रपट दे और इस बात की भी रपट दें कि इसका प्रतिकार करने के लिए कहां तक तैयार हैं। जांच रपट मिलने पर 4 फरवरी 1928 को सरदार गए। उन्होंने वहां एक सभा में सीधा प्रश्न किया कि प्रतिरोध के लिए वह कहाँ तक तैयार हैं। इस सभा में उन्होंने कष्टों का वर्णन किया, जो सत्याग्रह के कारण आ सकते थे। उन्होंने सभा में यह भी कहा कि "मेरे साथ खेल न किया जाए, मैं ऐसे कामों में हाथ नहीं डालता जिसमें जोखिम ना हो। जो लोग जोखिम लेने को तैयार हैं मैं उनका साथ दूंगा, जनता तैयार थी।

और आप एक मात्र अस्त्र सत्याग्रह का ही बाकी रहा। सरदार ने इन दिनों बहुत परिश्रम किया। वे गांव-गांव पहुंच कर किसानों को सत्य एवं अहिंसा के सिद्धांतों को समझाते थे। उनके भाषण बड़े ही स्पष्ट एवं हृदयग्राही होते थे। वे लोगों की मौन आत्मा में खलबली मचा देते थे। सरदार कभी बारदोली में गर्जना करते तो रातों-रात दूसरे गांव पहुंच जाते और आप और भीड़ में उनका भाषण होता। इस चमत्कार का वर्णन करते हुए बम्बई के एक नेता ने बम्बई की एक सार्वजनिक सभा में उन्हें 'सरदार' कह कर पुकारा गांधीजी को उनका नाम पसंद आया।

सरदार पटेल की यथार्थ एवं ठोस कार्यशैली का किसानों पर अच्छा प्रभाव पड़ा। महादेव देसाई ने लिखा है- "किसानों की भाषा एवं मुहावरे से भली-भांति परिचित होने के कारण उनके मन को उद्वेलित करने वाले भाषणों ने किसानों को अभिभूत कर दिया" आदिवासियों ने मद्दपान करना छोड़ दिया। महिलाओं ने पीतल के भारी गहने पहनना छोड़कर खादी और चर्खे को अपना लिया। गांव-गांव में सत्याग्रह के गीत गूंजने लगे। बड़ी-बड़ी जन सभाएं हुई। संपत्ति की जब्ती-कुर्की, नीलामी, झूठे मुकदमे और जेल की सजा आदि से भी किसान हतोत्साहित नहीं हुए। गांव वालों ने कुर्की करवाने वाले अफसरों के तरीकों को बेकार बनाने वाली कई उक्तियां खोज निकाली। बेगार की प्रथा को किसानों ने खत्म कर दिया।

स्वयंसेवकों के अथक एवं नि:स्वार्थ सेवा का आम जनता पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा। कतिपय सभ्रांत महिलाएं भी खादी पहनने लगी तथा खादी का प्रचार करने लगी। लोगों को इससे बड़ी प्रेरणा मिली। हृदयनाथ कुंजराव, एस.जी. बझे और दूसरे निष्पक्ष पर्यवेक्षकों ने बारीकी से इस समस्या का अध्ययन करके सत्याग्रह यों की मांगों को उचित ठहराया। इससे सत्याग्रह का नैतिक पक्ष उजागर हुआ।

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