जगदीश महतो (मास्टर साहब) : सामंतों से मिले अपमान के कारण जिन्होंने अपनी जवान पत्नी का सिंदूर पोंछवा दिया था
Patelon ki Baaten
Wed, Dec 10, 2025
दुर्गेश कुमार
कुछ नायक वैसे होते हैं जो जबरिया कलम से गढ़े जाते हैं। कुछ नायक वैसे होते हैं जो त्याग और बलिदान से अमिट छाप छोड़ जाते है, और कलम के चितेरे उन्हें पन्ने पर उतारने की कोशिश करते है।
आज हम उस नायक की बात करेंगे जिसके बारे में कलम तो चला लेकिन उसकी चर्चा का दायरा सीमित है। ऐसा लगता है कि इस नायक को एक बड़ा वर्ग खलनायक के रुप में देखता है। शायद इसलिए बङे बङे साहित्यकारों का पात्र होने के बावजूद इस नायक की चर्चा बहुत कम होती है।
जिसने सामंतों से मिले अपमान के घूंट पीने से इन्कार करते हुए अपनी जवान पत्नी से कहा कि तुम अपनी मांग का सिंदूर पोंछ दो। क्योंकि जिसके पति के प्रतिष्ठा का हनन होता है वो औरत विधवा की तरह ही होती हैं।
इतना सुनते ही उस क्रान्तिकारी पुरुष की क्रान्तिकारी महिला ने अपनी मांग से सिंदूर पोछ लिया।
कभी कभी यह समाज बहुत निर्मम हो जाता है। वह भुला देता है अपने नायकों को.. वह मोल नहीं समझता है अपने योद्धाओं को.. जबकि उनके बलिदान के बदौलत ही यह समाज खुली हवा में सांस ले रहा होता है।
देश आजाद होने के समाज की दशा स्वतः नहीं सुधरी। इसके लिए हजारों लोगों के कीमत चुकाई है।
ऐसे ही एक शख्स का नाम है जगदीश महतो उर्फ़ जगदीश मास्टर। जिसने पूरी जिंदगी गरीबों के अधिकार और हक के लिए जिया। वह 37 साल की उम्र में अपनी मौत को गले लगाया ताकि अपनी जान बचाने के लिए उसके हाथों से अन्याय न हो।
वह भोजपुर जो दो तरफ से गंगा और सोन से घिरा हुआ है। 1960 के दशक में भोजपुर और बक्सर एक ही जिले थे। ब्लॉक 16 थे। भोजपुर की आबो हवा में सामंतवाद से सिसकती हुई आवाजें थी, सूखा और अकाल था।
भोजपुर का एक ब्लॉक सहार आरा शहर से 40 किलोमीटर दूर सामंती मिजाज के लिए कुख्यात था। यह भोजपुर का वह इलाका है जहां दलितों की आबादी अन्य क्षेत्रों के मुकाबले अधिक है।
इसी ब्लॉक में एक गांव है जिसे एकवारी कहते हैं।
इसी गांव में कोयरी समाज के किसान परिवार में जन्मे जगदीश महतो पढ़ाई और शारीरिक कद काठी में औसत थे। जगदीश मास्टर रोज अपने गांव और आसपास के जुल्म की कहानियां देखते थे।
सामंती सोच के दबंग लोग गरीबों, कमजोरों की बहु बेटियों की प्रतिष्ठा का हनन करते, जोर जबदस्ती करते, देख सुन जगदीश महतो के युवा मन में विद्रोही जन्म ले रहा था। उन दिनों खेतों में जबरन मजदूरी के लिए मजबूर करना आम बात थी।
जगदीश महतो आरा में रहकर पढाई पूरी कर रहे है। गांव वापस आते तो सामंती जुल्म की कहानियां सुनकर व्यथित हो जाते थे।
जगदीश मास्टर के बारे में कम लिखा गया है। किन्तु महाश्वेता देवी ने अपनी पुस्तक मास्टर साब में उनकी कहानी की झलक मिल जाती हैं।
जब सामंतवाद की दलदल में फंसे भोजपुर के एकवारी गाव में दलितों, वंचितों, गरीबों की बहु बेटियां की अस्मिता तार तार हो रहीं थीं तब युवक जगदीश महतो के दिमाग में विद्रोह पनप रहा था।
स्कूली शिक्षा प्राप्त करने के बाद वो जैन स्कूल आरा में विज्ञान के शिक्षक नियुक्त हुए। जगदीश मास्टर गांव आते तो रामेश्वर अहीर बार-बार ताने मारते की पढ़ाई किस लिए हो अपने लोगों को छोड़कर चले जाओगे। उधर बचपन से ले कर जवानी तक जगदीश महतो ने कई ऐसी घटनाओं को देखा था जिसकी वजह से उनके मन का विद्रोही बार बार दहाड़ लगाता था।
ऐसे में ही 1967 के चुनाव में सहार विधानसभा से कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार थे एकवारी पंचायत के मुखिया रामनरेश राम। राम नरेश राम को समर्थन के लिए पढ़े लिखे जगदीश मास्टर जो वक्ता भी थे का साथ मिल गया। सामंत जगदीश मास्टर से और चिढ़े हुए थे।
जबकि अगड़ी जातियों के समर्थन से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की तरफ से उम्मीदवार थे राजदेव राम।
इस चुनाव में एकवारी गांव में अगड़ी जातियों के लोग बूथों को कब्ज़ा करने की सभी नीयत से जमा हुए थे। लेकिन इसकी खबर पाकर सभी बूथों पर कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थक भी जमा हुए थे।
एकवारी के दबंग नथुनी सिंह ने जब यह देखा कि कहीं कोई चारा न चल रहा है तो अपने सभी लठैत को लेकर एक ही बूथ पर जमा हुआ। और बंदूक का भय दिखा कर वोटरों को हटा कर फर्जी वोट डालने लगा।
खबर पहुंचते ही जगदीश मास्टर अपने एक साथी लोहा चमार के साथ पहुंचे। नथुनी सिंह को इसी का इंतजार था। जगदीश मास्टर पर लाठियों की बरसात कर दी गई। वो नीचे गिर पड़ते हैं।
लोहा चमार चिल्ला रहा था कि कौन हाथ लगा कर निकल जायेगा। तब इधर से भी लोग लाठियां चला ने लगे। नथुनी सिंह के लोगो की भी धुनाई हुईं।
लेकिन मास्टर साहब बेहोश खून से लथपथ थे। अस्पताल ले जाया गया। हाथ पांव और सीने की हड्डियां टूट चुकी थी। शरीर नीला पड़ गया था।
डाक्टर ने कहा कि यह बच नहीं सकता है। पांच माह तक अस्पताल में रहने के बाद जगदीश मास्टर बच गए। चुनाव में रामनरेश राम जीत चुके थे।
.......
साल 1968 था। आरा शहर ने एक शाम में एक जुलूस को अपनी गलियों से गुजरते हुए देखा। गरीब और दलितों की हाथों में जलती मशाले थीं। और उस जुलूस का नेतृत्व कर रहे थे मास्टर साब के नाम से चर्चित जगदीश महतो उर्फ जगदीश मास्टर। जुलूस में शामिल लोग नारा लगा रहे थे- हरिजनिस्तान लेके रहेंगे।
पश्चिम बंगाल में नक्सलबाड़ी की घटना के बाद नक्सली गतिविधियां बिहार में भी तेजी से बढ़ रही थी। मास्टर साहब जान-बूझकर विदाउट टिकट ट्रेन में यात्रा करके पकड़े गए, ताकि जेल में नक्सलियों से मुलाकात हो सके।
अपनी जवानी गरीबों के हक के लिए कुर्बान कर दिया। तारीख़ 10 दिसंबर 1972 कस्बा बिहिया। अनाज मंडी में दबंग धाना सिंह अपनी फसल बेचने के लिए आया था। सामंती मिजाज का धाना सिंह पर गरीबों का उत्पीड़न, महिलाओं की मान मर्यादा को तार तार करने का गुनाह था। कहते हैं कि पुलिस प्रशासन भी उस पर कार्रवाई नहीं कर पाती थी।
जगदीश महतो यानी मास्टर साहब ने सबक सिखाने के लिए बिहिया की अनाज मंडी की तरफ ट्रक से एक लिफ्ट लेकर अपने साथी रामायण राम के साथ बिहिया मंडी पहुंचते हैं। अनाज मंडी के पास उस दबंग धाना सिंह के सीने में पिस्तौल की गोलियां दाग़ कर काम तमाम कर देते हैं।
फ़िर वो वापस लौटने के लिए बाग बागीचे का रास्ता पकड़ते हैं। किसी ने हल्ला किया चोर चोर, डकैत.. घटना स्थल से तकरीबन 700 मीटर वापस लौटे ही होंगे कि मुशहर जाति के लोग उनका पीछा करने लगे।
आगे आगे मास्टर साहब और उनके साथी रामायण राम... और पीछे पिछे मुशहर जाति के लोगों की भीड़।
अचानक एक व्यक्ति रास्ते के बीचों बीच सामने से आकर पकड़ लेता है। रामायण राम अपनी गोलियां उसके सीने में दाग देते हैं।
तब तक मुशहर जाति के दर्जन भर लोगों की भीड़ उनकी तरफ लठी डंडों के साथ बढ़ रही थी।
कामरेड रामायण राम ने पिस्तौल तानी तो जगदीश मास्टर ने कहा कि गोली मत चलाओं। इन्ही लोगों के हक के लिए हम लड़ रहे हैं, आज अपनी जान के लिए इन पर गोली चलायेंगे.. यह स्वीकार नहीं हैं।
रामायण राम ने पिस्तौल नीचे कर लिया। मुशहर जाति के लोगो की भीड़ अपने नायक की तरफ बढ़ी जिसका नाम तो वो सुने थे लेकिन चेहरे से अंजान थे।
भीड़ ने अपने ही नायक पर लाठियों की प्रहार किया। फ़िर अनगिनत लाठियों के प्रहार से जगदीश मास्टर और रामायण राम की मौत हो गई।
लाश बिहिया थाना में गया तो तहकीकात में पता चला कि यह शव सामंतवाद का काल बन कर उभरे जगदीश मास्टर का है।
लाठियां चलाने वाले मुशहरों की बस्ती में चीत्कार गूंज उठा। चूल्हा उपास रहा। अफसोस के आंसू फूट पड़े कि कि यह कौन सा पाप हो गया। जो हमारी लड़ाई लड़ता था हमने अनजाने उसी की हत्या कर दी। मुशहर की बस्ती में शोक की लहर छा गई।
पुलिस मार डालती, कोई जमींदार मार डालता तो कोई दुख नहीं होता। लेकिन उन्हें उन लोगों ने मार डाला। उनके अपने ही लोगों ने।
बाद में उसी बस्ती में 10 दिसंबर 2012 को जगदीश मास्टर के स्मारक के लिए मुशहर समुदाय के एक व्यक्ति ने ज़मीन दिया। जिस पर एक स्मारक है।...स्मारक पर धूल उड़ते हैं।
संयोगवश, 10 दिसंबर 1935 को ही कॉमरेड जगदीश का जन्म सहार प्रखंड के एकवारी गांव में हुआ था।
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