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समतामूलक समाज के संस्थापक राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज : भारतीय समतामूलक महासभा के गठन का औचित्य!

Patelon ki Baaten

Sun, Mar 29, 2026

डॉ. हरिश्चंद्र पटेल

आप सब जानते हैं कि सदियों से वर्णवादी, जातिवादी एवं पाखंडवादी सामाजिक व्यवस्था की जंजीरों में जकड़ा इंसान जब अपनी अस्मिता के लिए जूझ रहा था। तो सैकड़ो वर्ष पूर्व 26 जून 1874 को कोल्हापुर जिले के कागल गांव में आशा की किरण लिए हुए एक अत्यंत होनहार बालक का जन्म हुआ। जिसका बचपन का नाम यशवंत राव था। उनके माता का नाम राधाबाई मुधोल तथा पिता का नाम जय सिंह राव उर्फ बाबा साहब घाटगे था। उनके दत्तक पिता का नाम शिवाजी चतुर्थ तथा माता का नाम आनंदीबाई था। यशवंत राव कालांतर में दलित एवं पिछड़ों के उत्थान की आधारशिला रखकर राजर्शी छत्रपति शाहूजी महाराज के नाम से प्रख्यात हुए। छत्रपति शाहूजी महाराज अल्प आयु में जैसे ही कोल्हापुर की राजगद्दी पर आसीन हुए, उसके कुछ वर्षों बाद ही कोल्हापुर राज्य के पुरोहितों के बहकावे में आकर कुछ जागीरदारों ने बगावत करना शुरू कर दिया था। इससे विचलित होकर छत्रपति शाहूजी महाराज की पत्नी और कोल्हापुर की महारानी लक्ष्मीबाई ने महाराज से कहा कि रियासत में विरोध कर रहे जागीरदारों के ऊपर सैन्य कार्यवाही करके आप उन्हें रोकते क्यों नहीं? इस पर शांत चित्त, दूरदृष्टा, यशस्वी छत्रपति शाहूजी महाराज ने कहा कि जब हम मराठा वंश के इतिहास पर नजर डालते हैं तो यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि हमारे पूर्वज पिछले 220 वर्षों में एक दूसरे से रियासत और राजगद्दी के लिए युद्ध ही करते रहे। परिणाम स्वरुप महाप्रतापी छत्रपति शिवाजी महाराज के बाद मराठा वंश का दृष्टांत पूरी तरह से अंधकारमय दिखाई देता है। हमने कोल्हापुर राजपद की जिम्मेदारी संभालते समय संकल्प लिया था कि अब हम युद्ध नहीं करेंगे, बल्कि इंसानियत को दृष्टिगत रखते हुए मानव समाज के कल्याण के लिए दृढ़ संकल्पित रहेंगे। इस तरह छत्रपति शाहू जी महाराज ने सर्वप्रथम राज्य की सीमा के विस्तार के लिए युद्ध करने के बजाय समाज में समता, समानता एवं विश्व बंधुत्व की भावना की मानवीय विचारधारा को आत्मसात करते हुए समाज में भाईचारा एवं सौहार्दपूर्ण वातावरण कायम करने की दिशा में आगे बढ़े।

"समतामूलक समाज की स्थापना:---"

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तदांतर उन्होंने कोल्हापुर में बाल - विवाह प्रथा पर प्रतिबंध लगाया। छुआ- छूत और ऊंच - नीच की पाखंडवादी व्यवस्था का समापन कर उन्होंने सर्वप्रथम समतामूलक समाज की स्थापना किया। छत्रपति शाहूजी महाराज ज्योतिबा राव फुले के सामाजिक और शैक्षिक योगदान से काफी प्रभावित थे। इसलिए सामाजिक कुरीतियों एवं विसंगतियों के उन्मूलन हेतु उन्होंने अपने दलित कर्मचारी गंगाराम कांबले को पैसे देकर चाय की दुकान खुलवाया और सैकड़ो लोगों की उपस्थिति में स्वयं उस दुकान पर बैठकर चाय पिया। गंगाराम कांबले ने अपनी दुकान का नाम सत्य सुधारक रखा था। छत्रपति शाहूजी महाराज ने किसानों के लिए सरकारी समितियों की स्थापना किया। आधुनिक कृषि उपकरणों की खरीद के लिए किसानों को क्रेडिट कार्ड उपलब्ध कराया। किसानों के फसल की उपज और संबंधित प्रौद्योगिकी को बढ़ाने के लिए राजा एडवर्ड कृषि संस्थान की स्थापना किया। उन्होंने 18 फरवरी 1907 को राधागारी बांध की शुरूआत किया। सन 1912 में उन्होंने अपने राज्य में हर एक किलोमीटर पर विद्यालय स्थापित कर सर्व समाज के लिए प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य कर दिया था। 25 जुलाई 1917 को उन्होंने अपने राज्य में सभी के लिए अनिवार्य मुक्त प्राथमिक शिक्षा लागू कर दिया था। जिसका परिणाम यह रहा कि स्वतंत्र भारत का 100% साक्षर होने वाला पहला जिला कोल्हापुर बना था। उन्होंने 1917 में बलूतदारी तथा 1918 में वतनदारी प्रथा का अंत किया। छत्रपति शाहू जी महाराज ने धन देकर डॉ भीमराव अंबेडकर को शिक्षा ग्रहण करने के लिए विदेश भेजा। उन्होंने डॉ भीमराव अंबेडकर के समाचार पत्र मूकनायक के संचालन और प्रकाशन में भी सहायता किया। छत्रपति शाहूजी महाराज ने 19 से 21 अप्रैल 1919 को कानपुर में आयोजित अखिल भारतीय कुर्मी क्षत्रिय महासभा के 13 वें अधिवेशन की अध्यक्षता किया। जहां उन्हें किसानों द्वारा राजर्षि के खिताब से नवाजा गया। 9 जुलाई 1919 को उन्होंने एक आदेश जारी किया कि कोल्हापुर राज्य के समस्त देवस्थानों की आय और संपत्ति पर राज्य का नियंत्रण होगा। इसके साथ ही मराठा जाति के पुजारी की नियुक्ति का भी आदेश जारी किया। 1920 में पूजा, पुरोहितों के प्रशिक्षण के लिए विद्यालय की स्थापना किया। सन 1919 में उन्होंने दलितों को अस्पताल में समानता पूर्वक इलाज कराने का अधिकार प्रदान किया। 15 अप्रैल 1920 में उन्होंने दलित छात्रों के लिए छात्रावास का निर्माण कराया। जिसका नाम था प्रिंस शिवाजी मराठा फ्री बोर्डिंग हाउस। उन्होंने पिछड़ी जातियों के गरीब लेकिन मेधावी छात्रों के लिए छात्रवृत्ति लागू किया। विभिन्न समुदायों को संगठित करने के लिए उन्होंने मिस क्लार्क बोर्डिंग स्कूल की स्थापना किया। 11 नवंबर 1920 को छत्रपति शाहूजी महाराज ने एक हिंदू कोड बिल पारित कर सामाजिक रूढ़िवाद को समाप्त करने का भर्षक प्रयास किया था।

छत्रपति शाहू जी महाराज ने 26 जुलाई 1902 को कमजोर वर्ग के लिए सरकारी नौकरियों में 50% आरक्षण लागू कर देश के इतिहास में किसी राजा के द्वारा अपनी रियासत में दलितों - पिछड़ों को समान रूप से आगे बढ़ने का पहली बार समान अवसर प्रदान किया। यह जाति के आधार पर भारत में पहला आरक्षण था। इसीलिए शाहू जी महाराज को आरक्षण का जनक कहा जाता है। इतना ही नहीं 1917 में जब पुरोहितों ने विरोध जताते हुए चिकित्सालय सहित अन्य कार्यालयों से भारी संख्या में त्यागपत्र देना शुरू कर दिया तो राजर्शी छत्रपति शाहूजी महाराज ने 90% आरक्षण लागू कर भारत के इतिहास में समानता का अवसर प्रदान करने की दिशा में एक बड़ी कील ठोकर इतिहास रच दिया था। जो बाद में भारतीय संविधान में दलितों - पिछड़ों को आरक्षण प्रदान करने का आधार बना। इसके अतिरिक्त छत्रपति शाहूजी महाराज ने कमेरा समाज के उत्थान के लिए अन्य कई सामाजिक एवं शैक्षिक सुधार किया। छत्रपति शाहू जी महाराज जीवन पर्यंत सामाजिक उत्थान के लिए संघर्ष करते रहे। उनके ऊपर कई बार जानलेवा हमला भी हुआ। अंततः 6 मई 1922 को दलितों - पिछड़ों के मसीहा राजर्शी छत्रपति शाहूजी महाराज की मुंबई में संदिग्ध मौत हो गई। इस मामले में न तो किसी सरकारी एजेंसी द्वारा जांच कराया गया और न ही इतिहासकारों ने प्रकाश डाला।

अतः महामानव राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज के द्वारा सामाजिक उत्थान के क्षेत्र में किए गए कार्यों और उनके त्याग, समर्पण व योगदानों को देखते हुए भारतीय कुर्मी महासभा उत्तर प्रदेश उन्हें हृदयतल से नमन करती है। साथ ही साथ सभी महानुभावों से विनम्र अनुरोध करती है कि ऐसे महान समाज सुधारक, समाजवाद के जन्मदाता, दलितो और पिछड़ों के मसीहा, समतामूलक समाज के संस्थापक और आरक्षण के जनक राजर्शी छत्रपति शाहूजी महाराज के जन्मदिन 26 जून को हम सभी लोग अपने-अपने घर पर 50-50 दीप प्रज्वलित कर समतामूलक दीपोत्सव के रूप में मनाए। जिससे हमारे नौनिहाल बच्चे छत्रपति शाहूजी महाराज के त्याग और समर्पण को स्मरण रख सके तथा वर्तमान समाज में समतामूलक समाज की जड़े मजबूत हो सके। जिससे सभी दलित व पिछड़े वर्ग के लोग महामानव राजर्शी छत्रपति शाहूजी महाराज के आदर्शों पर चलकर और समाज व देश के विकास में अपनी अग्रणी भूमिका निभा सके।

भारतीय समतामूलक महासभा के गठन का औचित्य?

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16 सितंबर 2025 को माननीय उच्च न्यायालय के निर्देश पर 21 सितंबर 2025 को उत्तर प्रदेश सरकार ने सभी जातीय संगठनों की बैठकों एवं सम्मेलनों पर शासनादेश जारी करते हुए पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया। इसके उपरांत 01 मार्च 2026 को लखनऊ के बाबूराम रामाधीन सिंह इंटर कॉलेज के सभागार में प्रदेशीय वैचारिक संगोष्ठी के दौरान "भारतीय समतामूलक महासभा" का सर्व सम्मति से गठन किया गया।

भारतीय समतामूलक महासभा का मुख्य उद्देश्य:---

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भारतीय समता मूलक महासभा के माध्यम से कृषि कार्य करने वाली जातियों को एक मंच पर लाकर समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वास एवं पाखंडवाद के प्रति लोगों को जागरूक करना है। साथ ही साथ सामाजिक एवं राजनीतिक समृद्धि हेतु राजर्शी छत्रपति शाहूजी महाराज की सार्वभौमिक विचारधारा समतामूलक समाज की संकल्पना* एवं भारतीय संविधान के मौलिक अधिकार में प्रदत्त समानता के अधिकार को आम जनमानस में व्यापकता प्रदान करना है। इस महासभा में कृषि कार्य करने वाली जातियों के सभी समाजसेवियों एवं प्रबुद्ध जनों का हार्दिक स्वागत है।

(लेखक भारतीय कुर्मी महासभा उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष हैं।)

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