उत्तर प्रदेश की राजनीति : बीजेपी के सियासी शतरंज की चाल में फंसते जा रहे कुर्मी
Patelon ki Baaten
Wed, Dec 31, 2025
राजेश पटेल
यह समझना गलत है कि पंकज चौधरी को भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष बनाकर सूबे के 12 फीसद से ज्यादा कुर्मी समाज पर कोई अहसान किया है। दरअसल उसने कुर्मियों का चुनावी शिकार करने के लिए जाल बिछाकर पंकज चौधरी के रूप में चारा फेंका है, जिसमें पूरा कुर्मी समाज फंसता नजर आ रहा है।
ब्राह्मण विधायकों की बैठक को लेकर पंकज चौधरी के बयान जो क्रिया-प्रतिक्रिया हो रही है, वह दरअसल भाजपा की सुनियोजित और सोची-समझी योजना है। और, कुर्मी समाज के बेवकूफाना रवैये के कारण वह अपनी इस योजना में सफल भी होती दिखाई दे रही है।
सोशल मीडिया पर ब्राह्मण समाज के कुछ लोगों की पोस्ट पर कुर्मी समाज के कुछ युवा और संगठन इस तरह से प्रतिक्रिया दे रहे हैं, मानो अब पूरा कुर्मियान पंकज चौधरी के पीछे भाजपा का झंडा लेकर दौड़ पड़ेगा। और, ब्राह्मण भाजपा से अलग हो जाएंगे।
भाई, भाजपा तो यही चाहती ही है। वह चाहती है कि ब्राह्मण जितना पंकज चौधरी और उनकी जाति को लेकर टिप्पणी करेंगे, कुर्मी समाज के युवाओं का खून और खौलेगा। वह पंकज चौधरी के साथ खड़े होंगे।
अब लाख टके का सवाल यह है कि यदि पंकज चौधरी के साथ कुर्मी भाजपाई बन जाते हैं तो क्या ब्राह्मण भाजपा से अलग हो जाएंगे? जवाब है नहीं। आज के दौर में ब्राह्मण भारतीय जनता पार्टी से अलग नहीं हो सकता। कुर्मी कुछ और भले जुड़ जाएं।
यह बिसात 2027 के मद्देनजर बिछाई जा रही है। क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में कुर्मियों का वोट समाजवादी पार्टी के पक्ष में गया था। यही कारण रहा है कि सपा को 37 सीटें मिली थीं। और कांग्रेस को छह। इसके मुकाबले भाजपा को एनडीए को मात्र 36 सीटों पर विजय मिली। इसमें भाजपा को 33 सीटें। एनडीए और इंडिया के वोट प्रतिशत में भी न के बराबर अंतर रहा।
इस चुनाव के बाद भाजपा को लगा कि एनडीए में शामिल अपना दल एस का प्रभाव अपनी जाति के मतदाताओं पर कम हुआ है। क्योंकि खुद अपना दल एस एक सीट हार गई थी। केवल अनुप्रिया पटेल ही मिर्जापुर से किसी तरह से जीत सकी थीं। इस चुनाव के एक साल बीतते-बीतते सरदार सेना की सक्रियता इतनी बढ़ गई कि कुर्मी समाज की सहानुभूति और झुकार इसके अध्यक्ष डॉ. आरएस पटेल की ओर तेजी से बढ़ने लगा। कुर्मी समाज पर जहां अत्याचार हो रहा है, वहां डॉ. आरएस पटेल पुलिस की बैरिकेटिंग को धता बता हाजिर हो रहे हैं। उन्होंने भी समाज का झुकाव अपनी ओर देख एक राजनैतिक पार्टी का गठन कर लिया। नाम रखा है-जनहित संकल्प पार्टी। अभी हाल ही में इसके प्रदेश कार्यालय के लखनऊ में उद्घाटन के अवसर पर उपस्थित भारी हुजूम ने बता दिया कि इस पार्टी का भविष्य उज्ज्वल है।
उधर अपना दल कमेरावादी की नेता सपा विधायक पल्लवी पटेल के भी कार्यक्रमों में हाल के दिनों में भीड़ कुर्मी समाज की भीड़ बढ़ने लगी है। सपा पीडीए का राग गा ही रही है। जाहिर है कि जनहित संकल्प पार्टी और अपना दल कमेरावादी का गठबंधन आगामी चुनाव 2027 में सपा के साथ ही हो सकता है। ऐसी स्थिति में कुर्मियों का पूरा का पूरा वोट इधर ही शिफ्ट होने की संभावना ने भाजपा नेतृत्व को बेचैन कर रखा है।
इसी कारण पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष के रूप में प्रोजेक्ट करके ब्राह्मण बनाम कुर्मी कराया जा रहा है। पिछले लोकसभा चुनाव में रघुराज प्रताप सिंह से अनुप्रिया पटेल के खिलाफ बयान दिलवाकर ठाकुर बनाम कुर्मी कराया गया था। क्योंकि भाजपा जानती है कि ब्राह्मण हिंदुत्व के मुद्दे पर उससे अलग नहीं हो सकते। उसे कुर्मियों को जोड़ना है, तभी 2027 में फिर से भाजपा की सरकार उत्तर प्रदेश में बन सकती है। इसीलिए अभी से इस तरह की बिसात बिछाई जाने लगी है।
वैसे ओबीसी का जितना नुकसान भाजपा की सरकार के कार्यकाल में हुआ है, शायद पहले कभी नहीं हुआ। कुर्मियों पर जितना अत्याचार इस समय हो रहा है, शायद कभी नहीं हुआ। आए दिन कहीं न कहीं सवर्णों द्वारा कुर्मी समाज के लोगों पर हमले की खबरें आ रही हैं। कहीं-कहीं हत्या की भी। लेकिन आरोपितों के सवर्ण होने के कारण उनके घरों पर बुलडोजर नहीं चलाए जा रहे हैं। उल्टे हाल-चाल लेने जाने वालों पर ही मुकदमा हो जा रहा है। इन मसलों पर पंकज चौधरी ने कभी मुखर होकर विरोध नहीं किया। फिर कैसे वे कुर्मी समाज के शुभचिंतक हो गए। सिर्फ कुर्मी होने के कारण?
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