कुर्मियों की बातें : जब यदुनाथ सिंह पटेल ने हाईकोर्ट की बेंच पर किया कब्जा
Mon, Dec 1, 2025
राजेश पटेल द्वारा लिखित पुस्तक 'तू जमाना बदल' से...
आजाद भारत के सबसे बड़े क्रांतिकारी श्रद्धेय यदुनाथ सिंह तब विधायक भी नहीं थे। बात वर्ष 1979 की है। वर्ष 1977 के आम चुनाव में मुगलसराय विधानसभा सीट से निर्दल ही मैदान में कूद पड़े थे। इसके पहले के आम चुनाव में भी मुगलसराय से ही निर्दल भाग्य आजमाया था। उस समय भी कम अंतर से हारे थे। वर्ष 1977 में भी जनता पार्टी की लहर के बावजूद यदुनाथ सिंह मात्र 1280 मतों के अंतर से हारे थे। विजयश्री जनता पार्टी के उम्मीदवार श्री गंजीप्रसाद यादव जी को मिली थी। यदुनाथ सिंह ने चुनाव परिणाम को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी।
तारीखों के बाद इस चुनाव याचिका को हाईकोर्ट ने खारिज कर दी। यदुनाथ सिंह ने साथियों से कहा कि न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार का घुन लग गया है। इसे ठीक करना ही होगा। उस दिन तो वे इलाहाबाद (अब प्रयागराज) से लौट आए, लेकिन कोलना निवासी सुशील बाबा (अब नहीं रहे), अदलहाट के शोभनाथ सिंह पटेल, मुगलसराय के आसपास के गांवों के निवासी मोहनलाल सोनकर, शकुंतलाल यादव और शमीम अहमद मिल्की, हरबंश सिंह सहित अन्य साथियों को साथ लेकर इलाहाबाद पहुंचे। अपने किसी काम से बाहर ही रह गए, लेकिन पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार शेष चारो साथी हाईकोर्ट की जिस बेंच ने इनकी याचिका को खारिज किया था, उसमें घुस गए।
राजेंद्र सिंह और रामआसरे सिंह बाहर ही थे। उस समय जस्टिस अमिताभ बनर्जी अपने चैंबर में थे। कोर्ट में जज की कुर्सी खाली थी, सो सुशील बाबा को उस पर आसीन करा दिया गया। शमीम अहमद मिल्की जनता के वकील बन गए। एक साथी पेशकार बन गया। इसी तरह से सरकार के वकील की भी भूमिका में एक साथी आ गए। करीब आधे घंटे तक हाईकोर्ट की इस बेंच पर इन लोगों का कब्जा रहा। अदालत की कार्यवाही समानांतर चलती रही। इसी बीच एक बार जस्टिस बनर्जी आए भी, लेकिन यहां का नाटकीय घटनाक्रम देखकर वे फिर अपने चैंबर में जाकर बैठ गए। उन्होंने पुलिस को सूचना भेजवाई। कुछ ही देर में कोर्ट परिसर में मौजूद अधिवक्ताओं के बीच यह खबर जंगल की आग की तरह फैल गई। यदुनाथ सिंह भी चूंकि परिसर में ही थे, सो वे भी भागकर आए। अधिवक्ता कक्ष में घुसना चाहते थे और यदुनाथ सिंह गेट पर दीवार की तरह खड़े हो गए। कहा कि खबरदार इधर जो आया। इसके बावदूद कुछ वकील जुटे और यदुनाथ सिंह व इनके साथियों पर हमला कर दिया। कुछ ही देर में पुलिस ने आकर सभी को हिरासत में ले लिया। जो साथी बाहर थे, वे खिसक लिए।
लिस ने एफआइआर दर्ज कर सभी को जेल भेज दिया। एक अधिवक्ता ने हाईकोर्ट की अवमानना का भी केस दायर कर दिया। इसकी सुनवाई जस्टिस जगमोहन सिन्हा व एक अन्य जज की संयुक्त बेंच में शुरू हुई। चूंकि मामला हाईकोर्ट की बेंच पर कब्जा का था, सो कोई भी वकील यदुनाथ सिंह व इनके साथियों की पैरवी करने के लिए तैयार नहीं हुआ। लिहाजा ये लोग खुद ही अपने समर्थन में बहस करते थे। इसी बीच शमीम अहमद मिल्की ने केस से जुड़े सभी दस्तावेजों की हिंदी में प्रतियों की मांग कर दी। लंबी बहस के बाद जस्टिस जगमोहन सिन्हा ने इनकी मांग को स्वीकार करते हुए हिंदी में प्रतियां उपलब्ध कराने के आदेश दिए। हालांकि इसमें समय लगा। बाद में अदालत की अवमानना के इस केस में यदुनाथ सिंह व इनके साथियों को तीन-तीन माह के सादे कारावास की सजा सुनाई गई थी, जिसे बनारस जेल में काटा भी।
कुर्मियों की बातें : क्रांतिपुरुष यदुनाथ सिंह पटेल ने 'तू जमाना बदल' नारा पहली बार कब लगाया?
Mon, Dec 1, 2025
राजेश पटेल
मिर्जापुर जनपद की चुनार विधानसभा से लगातार चार बार विधायक चुने गए आजाद भारत के सबसे बड़े क्रांतिकारी श्रद्धेय यदुनाथ सिंह ने पूरे पूर्वांचल में एक नया नारा दिया-तू जमाना बदल। पढ़ने या बोलने में यह जितना आसान है, उतनी ही मुश्किल घड़ी में यदुनाथ सिंह ने लगाया। इनको रामनगर का किला व इससे निकलने वाली राजा की सवारी कभी रास नहीं आई। कहते थे कि अब राजतंत्र समाप्त हो गया है। लोकतंत्र है। लोकतंत्र में राजा जनता होती है। शेष सब सेवक। फिर राजसी ठाट-बाट और शान-ओ-शौकत के साथ पूर्व काशी नरेश की सवारी निकालने का कोई मतलब नहीं है।कतंत्र में कोई हाथी पर बैठकर रामलीला देखे, कोई जमीन पर। यह तो सरासर अन्याय है। यह तो राजतंत्र को पोसने जैसा है। राज्य छीन लिया गया, लेकिन राजसी ऐंठन गई नहीं। अभी भी काशी नरेश को अपनी जय कहलाना पसंद है। यह घोर आश्चर्य है। इसका तो हर स्तर पर विरोध होना चाहिए। फिर शुरू हो गया राजतंत्र का विरोध।
काशी के पास रामनगर में पूरे अश्विन मास रामलीला का आयोजन किया जाता है। इस रामलीला की खासियत यह है कि कथानक के आधार पर इसका स्थान बदलता रहता है। इसके लिए रामनगर की सीमा में लंका, अयोध्या, जनकपुरी, अशोक वाटिका आदि स्थान बने हैं। सभी स्थानों पर इतनी जगह है कि हजारों लोग एक साथ बैठकर रामलीला का आनंद ले सकते हैं। इस पर आज भी आधुनिकता का साया नहीं है। विद्युत रौशनी व साउंड सिस्टम का प्रयोग अभी भी नहीं किया जाता। बहुत ही जीवंत रामलीला होती है। इसके कई कारण हैं। जैसे वनवास के बाद राम और लक्ष्मण की भूमिका निभाने वाले पात्र भरत व शत्रुघ्न की भूमिका निभाने वाले पात्रों से नहीं मिलते। इनकी मुलाकात तभी होती है, जब लंका पर विजय प्राप्त कर राम अनुज लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ अयोध्या लौटते हैं। अन्य कारण भी हैं, जिनकी बदौलत यह रामलीला आज भी जीवंत ही नजर आती है।
रामलीला तभी शुरू होती है, जब काशी नरेश, अब उनके परिजन मंचन स्थल पर पहुंच जाते हैं। पूरे अश्विन माह रोज शाम को राजा की सवारी पूरे राजसी ठाट-बाट से किले के अंदर से निकलती है। शहर से होकर रामलीला स्थल तक जाती है। फिर वहां हाथी पर बैठकर पूरी रामलीला देखते हैं। आरती के बाद ही वापस लौटते हैं। आने और जाने के समय रास्ते में उनके सम्मान में जनता हर-हर महादेव के नारे आज भी लगाती है।
यदुनाथ सिंह को इसी राजसी ठाट-बाट से चिढ़ थी। जब राजा की सवारी गुजरती है तो संबंधित मार्ग पर यातायात रोक दिया जाता है। घटना 1982 की है। तब तक ये चुनार से विधायक चुन लिए गए थे। भरत मिलाप की रामलीला थी। इस दिन परंपरा के अनुसार यदुनाथ सिंह ने अब्दुल सत्तार, शमीम अहमद मिल्की, दौलत सिंह (मास्टर), विश्वकांत ओझा, शमीम अहमद देवलासी, रामदेव बिंद सहित कई लोगों के साथ रतनबाग तालाब के किनारे बाटी-चोखा, दाल, सब्जी और चावल आदि बनवाया। पोखरा में स्नान करके भोजन किया। फिर रामलीला देखने के लिए चौक की ओर चल पड़े। उस समय वे टेकर (एक तरह की जीप) से थे।
जा की सवारी निकलने का समय हो चुका था, सो वाहनों का आवागमन रोक दिया गया था। पंचवटी में इनको पुलिस वालों ने रोका तो कहा कि जब राजा की सवारी आ सकती है तो मेरी क्यों नहीं। आज का राजा मैं हूं। जनता ने मुझे चुना है। बहस के बाद मामला मारपीट तक पहुंचा। एक दारोगा व यातायात सिपाही की टोपी छीन ली। इसके बाद कुछ साथी किला के पास स्थित पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जी की प्रतिमा के पास चाय पीने चले गए। कुछ इधर-उधर घूमने।
एक दारोगा तथा दो सिपाहियों की पिटाई और उनकी टोपी छीन लिए जाने से पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया था। इन लोगों की तलाश शुरू हो गई। चाय की दुकान पर यदुनाथ सिंह, अब्दुल सत्तार और रामदेव बिंद मिल गए। सभी को वहां से घसीटते, मारते-पीटते थाना में ले जाया गया। अन्य साथी जो जहां थे, वहीं से भूमिगत हो गए। थाना में भी जमकर पिटाई की गई। इसके बाद लालबहादुर शास्त्री चिकित्सालय (लवेट) भेजा गया। पुलिसवाले चाहते थे कि अस्पताल से जल्दी छुट्टी मिल जाए तो जेल भेजा जाए, लेकिन वहां के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. अवस्थी ने साफ कह दिया कि अभी इनकी स्थिति ठीक नहीं है। कुछ भी हो सकता है। पुलिसवालों ने दबाव बनाया तो डॉ. अवस्थी ने साफ कह दिया कि फिर इनके मरने की जिम्मेदारी उनकी नहीं होगी। इस पर पुलिसवाले बैकफुट पर आ गए।
कुछ दिन के बाद स्वास्थ्य ठीक होने पर जेल भेजा गया। चौकाघाट जेल से जमानत पर जब छूटे तो वहीं चौराहे पर अपना अंगूठा चीरकर अब्दुल सत्तार, रामदेव बिंद सहित अन्य सभी साथियों के माथे पर अपने खून का तिलक लगाकर कहा कि 'तू जमाना बदल'।
बाद में यह नारा बहुत ही प्रचलित हुआ। लखनऊ के अपने विधायक निवास दारुलसफा के ए ब्लॉक में 166 नंबर कक्ष के बाहर दीवार पर सीमेंट से भी लिखवाया-तू जमाना बदल।